आखिर आजादी की असली परीक्षा कब होती है? जब कोई हमें रोक रहा हो या तब, जब कोई रोकने वाला ही न हो? पंकज त्रिपाठी के पास इसका अपना जवाब है।

बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने और लोगों से मिलने वाले पंकज ने भारत को कई रंगों में देखा है। मगर उनके लिए इन सारे रंगों के पीछे एक चीज हमेशा एक जैसी रही- अपनापन।
अमर उजाला से एक्सक्लूसिव बातचीत में उन्होंने आजादी, बदलते भारत, गांवों से निकलते युवाओं और उस जिम्मेदारी की बात की, जो आजादी के साथ आती है।

