इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि साझा आपराधिक मंशा के तहत कार्य करने पर प्रत्येक आरोपी पर दुष्कर्म का समान दायित्व बनता है, भले ही उसने स्वयं दुष्कर्म न किया हो। पीड़िता को पकड़ने और पहरा देने वाला व्यक्ति भी मुख्य अपराधी के बराबर दोषी होता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में दोषी सुभाष सिंह व शेर सिंह की अपील खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने दिया है।

रामपुर निवासी अपीलकर्ताओं पर थाना टांडा में दुष्कर्म के आरोप में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। आरोप था कि मार्च 1984 को पीड़िता और उसकी भतीजी गांव के जंगल में सूखी पत्तियां बीनने गई थीं। वहां पहले से मौजूद पांच आरोपियों ने दोनों महिलाओं को घेर लिया। दो आरोपियों ने महिलाओं को पकड़ लिया। दो अन्य ने उनके साथ दुष्कर्म किया और एक आरोपी पहरा देता रहा। पीड़िताओं के शोर मचाने पर परिजन मौके पर पहुंचे तो आरोपी फरार हो गए।

ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए पांच साल की सजा सुनाई। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि उन्होंने स्वयं दुष्कर्म नहीं किया। इसलिए उन्हें इस अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह भी कहा गया कि एक आरोपी केवल पहरा दे रहा था। इसलिए उस पर दुष्कर्म की धारा लागू नहीं होती।
हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 साझा आपराधिक मंशा के सिद्धांत पर आधारित है। यदि कोई व्यक्ति अपराध को सफल बनाने के उद्देश्य से सक्रिय सहयोग करता है, चाहे वह पीड़िता को पकड़ना हो या पहरा देना तो वह भी मुख्य अपराधियों के समान उत्तरदायी होगा। साझा मंशा के तहत किए गए अपराध में प्रत्येक सहभागी पूरे अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है। अन्य तथ्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने दोषसिद्धि के साथ ही पूर्व में दी गई सजा को बरकरार रखा।
