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Explainer:सजा-ए-मौत का तरीका बदलने वाली याचिका क्यों हुई खारिज, दुनिया में मृत्युदंड के कैसे-कैसे तरीके? – Why Was The Plea To Change The Death Penalty Method Rejected? What Methods Are Used Worldwide?

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मौत की सजा देने की प्रक्रिया

बीएनएसएस की धारा 393(5) के मुताबिक, मौत की सजा के आदेश में दोषी को गर्दन से तब तक फांसी देने का निर्देश होता है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। यानी भारत में कानून में निर्धारित तरीका फांसी है। यही वह प्रावधान है जिसे मौजूदा याचिका में चुनौती दी गई थी।

भारत में मौत की सजा का इतिहास कितना पुराना है?

भारत में मौत की सजा का इतिहास काफी पुराना है। विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट, 1967 के अनुसार, अलग-अलग दौर में अपराधों और उन्हें दी जाने वाली सजाओं के नियम बदलते रहे हैं।

मुगल काल में क्या नियम था?

मुस्लिम आपराधिक कानून में हत्या को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया था। जानबूझकर की गई हत्या को गंभीर अपराध माना जाता था और कुछ परिस्थितियों में इसके लिए मौत की सजा का प्रावधान था।

हत्या के मामलों में मृतक के परिजनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। अगर मृतक के करीबी रिश्तेदार हत्यारे को माफ कर देते थे और खून के बदले मिलने वाले मुआवजे यानी दियत को स्वीकार कर लेते थे, तो मौत की सजा से बचने की स्थिति बन सकती थी।

मौत की सजा केवल हत्या तक सीमित नहीं थी। कुछ अन्य गंभीर अपराधों में भी मृत्युदंड का प्रावधान था। इनमें कुछ परिस्थितियों में बार-बार चोरी और ऐसी डकैती जिसमें हत्या भी हुई हो, शामिल थे।

ब्रिटिश शासन आया तो क्या बदला?

ब्रिटिश शासन की शुरुआत के बाद मुस्लिम आपराधिक कानून को तुरंत पूरी तरह नहीं बदला गया। शुरुआती दौर में ब्रिटिश प्रशासन ने इसमें सीमित हस्तक्षेप की नीति अपनाई और कुछ बदलाव किए।

1772 में डकैती रोकने के लिए एक प्रावधान किया गया था, जिसके तहत डकैतों को उनके गांव में फांसी देने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, डकैतों के परिवार और गांव वालों को दी जाने वाली अतिरिक्त सजा बाद में लागू होना बंद हो गईं।

इसके बाद ब्रिटिश शासन में भारत के आपराधिक कानून को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसी क्रम में भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी, 1860 आई। इसमें कई गंभीर अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया गया। हत्या के अलावा सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना, सेना में विद्रोह के लिए उकसाना, निर्दोष व्यक्ति को फांसी दिलाने वाली झूठी गवाही और हत्या के साथ डकैती जैसे अपराधों में भी मृत्युदंड का प्रावधान था।

फांसी कब बनी मौत की सजा का तरीका?

मौत की सजा देने के लिए फांसी का इस्तेमाल भी पुरानी कानूनी व्यवस्था का हिस्सा रहा है। पुराने प्रावधानों में दोषी को गर्दन से लटकाकर मौत की सजा देने का उल्लेख मिलता है। बाद के कानूनी ढांचे में भी फांसी का यह तरीका जारी रहा। 1967 तक भारत में मौत की सजा फांसी के जरिए दी जाती थी। उस समय यह सवाल भी उठाया गया था कि मृत्युदंड बरकरार रहने की स्थिति में इसे लागू करने के तरीके में कोई बदलाव किया जाना चाहिए या नहीं।

आजादी के बाद क्या हुआ?

1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन मौत की सजा खत्म नहीं की गई। आजादी के बाद भी मृत्युदंड भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का हिस्सा रहा और इससे जुड़े मामले अदालतों में आते रहे।

नवाब सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि उचित मामलों में मौत की सजा के अमल में अत्यधिक देरी सजा कम करने का आधार बन सकती है। हालांकि, इसे कोई सामान्य कानूनी नियम नहीं माना गया।

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