4 जून को जैसे ही अमेरिका-ईरान शांति समझौते की खबर आई, ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें लुढ़क गईं. 15 जून को भारत में रुपया डॉलर के मुकाबले 95.11 से उछलकर 94.65 पर पहुंच गया. शेयर बाजार में तेजी आई, लेकिन असली सवाल तो यह है कि आम आदमी की जेब पर इसका असर कब पड़ेगा, पेट्रोल-डीजल कब सस्ते होंगे, घर की रसोई गैस का सिलेंडर कब कम दाम पर मिलेगा और आखिर महंगाई से कब राहत मिलेगी? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
जैसे ही 14 जून को शांति समझौते की खबर आई, ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें लुढ़क गईं. 15 जून को भारत में इसका फौरन असर देखने को मिला:
- रुपया मजबूत हुआ: 15 जून को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.11 से उछलकर 94.65 पर पहुंच गया, जो 8 मई के बाद उसका सबसे मजबूत स्तर है. इससे आयातित कच्चे तेल की लागत कम होने लगी है. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि आने वाले दिनों में रुपया 93-94 के स्तर पर पहुंच सकता है.
- शेयर बाजार में उछाल: तेल-गैस शेयरों में तेजी आई और IT, बैंकिंग, मेटल जैसे सेक्टरों में खरीदारी बढ़ी. 15 जून को सेंसेक्स और निफ्टी करीब 2% चढ़ गए.
लेकिन असली सवाल आम आदमी को असर कब दिखेगा?
जवाब है अभी नहीं, क्योंकि तेल कंपनियों ने जून के पहले हफ्ते में ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए थे. 9 जून को पेट्रोल 7.5 रुपये से 8 रुपये प्रति लीटर और LPG सिलेंडर 29 रुपये महंगा हुआ था. अब नई कीमतों का असर आने में थोड़ा वक्त लगेगा.
2-4 हफ्तों में सबसे पहली राहत की उम्मीद
यह वह दौर होगा जब कीमतों में गिरावट की पहली लहर आ सकती है. यानी तेल 4-5 रुपये सस्ता हो सकता है. तेल कंपनियां हर 15 दिन में कीमतों की समीक्षा करती हैं. होर्मुज खुलने और अमेरिकी नाकेबंदी हटने की प्रोसेस शुरू होते ही कच्चे तेल की लैंडेड कॉस्ट घटनी शुरू हो जाएगी. अप्रैल-मई में यह लागत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. समझौते के बाद यह घटकर 84 डॉलर के आसपास आ गई है.
जब कंपनियों का लागत बोझ कम होगा, तो वे अगली कीमत समीक्षा (जुलाई के पहले हफ्ते) में पेट्रोल-डीजल के दाम 4-5 रुपये प्रति लीटर तक घटा सकती हैं.
क्या कंपनियां मुनाफा नहीं बनाए रखेंगी?
ऐसा हो सकता है, लेकिन सरकार पर दबाव होगा कि राहत आम आदमी तक पहुंचे. पिछली बार मार्च में सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती की थी, लेकिन कंपनियों ने उसका फायदा ग्राहकों को नहीं दिया था. इस बार हालात अलग हैं. सरकारी दबाव से कंपनियां ग्राहकों को राहत दे सकती हैं.
LPG सिलेंडर: जुलाई के पहले हफ्ते में 30-50 रुपए सस्ता होने की उम्मीद
यहां स्थिति थोड़ी अलग है. जून में दिल्ली में 14.2 किलोग्राम सिलेंडर 942 रुपये का हो गया था. अब इसकी मौजूदा कीमत 1,600 रुपये से ज्यादा हो चुकी है और सरकार हर सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये सब्सिडी दे रही है. शांति समझौते के बाद सऊदी सीपी (LPG की वैश्विक कीमत) में गिरावट आएगी. पिछले कुछ महीनों में यह 542 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 790 डॉलर पर पहुंच गई थी. कीमतों के सामान्य होने पर सिलेंडर की दर 30 से 50 रुपये घट सकती है.
1-3 महीनों में (जुलाई के अंत से सितंबर): कीमतों में दूसरी लहर
इस समय तक होर्मुज से तेल का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट लगभग बहाल हो जाएगा. अमेरिकी नाकेबंदी पूरी तरह हट चुकी होगी, माइन्स साफ हो चुकी होंगी और शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम सामान्य हो जाएगा. लेकिन तेल 70 डॉलर पर वापस नहीं जाएगा.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही होर्मुज पूरी तरह खुल जाए, कच्चा तेल जंग से पहले के 70-72 डॉलर प्रति बैरल पर लौटने की संभावना नहीं है. जियोपॉलिटिक्स और सप्लाई चेन में बदलाव की वजह से पूरे वित्त वर्ष 2026-27 में 92-95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने का अनुमान है.
इससे भारत का सालाना तेल आयात बिल बढ़कर 180 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जो जंग से पहले करीब 70 अरब डॉलर था.
इसका मतलब साफ है कि भले ही कीमतें घटें, लेकिन वे पुराने स्तर पर कभी नहीं लौटेंगी. फरवरी 2026 में पेट्रोल 96 रुपये प्रति लीटर के आसपास था, अब यह 102-108 रुपये के दायरे में है. यह नया ‘सामान्य’ होगा.
3-6 महीनों में (सितंबर-दिसंबर): महंगाई और दूसरी चीजों पर असर
यह असली टेस्ट है. तेल की कीमतों का सीधा असर खाना, कपड़ा और किराया समेत हर चीज पर पड़ता है. मई 2026 में रिटेल महंगाई (CPI) बढ़कर 3.93% पर पहुंच गई, जो करीब 15-16 महीने का उच्चतम स्तर था. रिटेल प्राइज इंडेक्स का आधार वर्ष बदल गया है, लेकिन 3.93% की दर पिछली सीरीज में करीब 15 महीने का हाई है. थोक महंगाई (WPI) तो और भी चौंकाने वाली थी, जो मई में 9.68% पर जा पहुंची. इसका मतलब है कि उत्पादक कंपनियों की लागत बहुत बढ़ गई थी और उन्हें आने वाले महीनों में वह बोझ ग्राहकों पर डालना था.
बड़ी रेटिंग एजेंसी CRISIL के मुताबिक, पूरे वित्त वर्ष 2026-27 में CPI महंगाई औसतन 5.1% रहेगी. अगर समझौते के बाद तेल की कीमतें 80-85 डॉलर के स्तर पर स्थिर हो जाएं, तो यह अनुमान 4.5-4.8% तक नीचे आ सकता है. लेकिन अगर तेल 95 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहा, तो 5.1% ही बना रहेगा.
कब मिलेगी महंगाई में राहत?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह तीन चरणों में मिलेगी:
- चरण 1 (जुलाई-अगस्त): सबसे पहले कमोडिटी की कीमतों में गिरावट आएगी. धातु, प्लास्टिक और रसायन जैसी चीजें सस्ती होंगी. लेकिन इसका असर सीधे आपकी जेब पर नहीं पड़ेगा.
- चरण 2 (अगस्त-सितंबर): थोक बाजार में सस्ता कच्चा माल का असर दिखना शुरू होगा. कंपनियां धीरे-धीरे उत्पादन लागत घटाएंगी.
- चरण 3 (अक्टूबर-दिसंबर): आम उपभोक्ता को असर मिलना शुरू होगा. त्योहारी सीजन के आसपास पैकेज्ड फूड, साबुन-डिटर्जेंट, कपड़े और दूसरे सामान की कीमतों में नरमी देखने को मिल सकती है.
क्यों सब कुछ पटरी पर आने में उतना वक्त लगेगा?
होर्मुज का फिर से खुलना और समझौता एक बहुत बड़ी राहत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अगले हफ्ते सब सस्ता हो जाएगा. चार बड़ीअड़चनें अभी भी बाकी हैं:
- इजरायल का खतरा: अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर से ठीक पहले इजरायल ने बेरूत में हिजबुल्लाह पर हमला किया था. अगर यह तनाव जारी रहता है, तो ईरान फिर से स्ट्रेट को निशाना बना सकता है या टैंकरों को नुकसान पहुंचा सकता है.
- परमाणु वार्ता: 19 जून के बाद 60 दिनों के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत होनी है. ईरान के पास 60% शुद्धता तक समृद्ध 440 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है, जो हथियार-ग्रेड स्तर से सिर्फ एक कदम दूर है. अगर यह वार्ता विफल हुई, तो डील फिर से बिखर सकती है.
- ग्लोबल सप्लाई चेन: 107 दिनों के युद्ध ने दुनिया की सप्लाई चेन को बुरी तरह बिखेर दिया था. टैंकर रास्ता बदल चुके थे, इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गए थे और कई जहाज फंस गए थे. इसे सामान्य होने में कम से कम 2-3 महीने लगेंगे. यहां तक कि बैठे हुए चीफ इकोनॉमिस्ट्स भी अगले साल रुपया 93-94 के बीच ही रहने का अनुमान लगा रहे हैं.
- सरकारी खजाने पर बोझ: जैसे ही कीमतें घटेंगी, सरकार के सामने एक दुविधा होगी कि क्या वह एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपना राजस्व बढ़ाए या कीमतें घटने दे? CRISIL के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत का तेल आयात बिल 13-14 बिलियन डॉलर बढ़ा देती है. महंगाई में 0.55-0.60% का इजाफा भी होता है. पिछले तीन महीनों में पेट्रोल-डीजल पर 7.5 रुपए और LPG पर 89 की बढ़ोतरी हो चुकी है. सरकार चाहेगी कि थोड़ी राहत जरूर मिले, लेकिन खजाने का नुकसान भी न हो.
यह सब इस उम्मीद पर टिका है कि 19 जून को शांति समझौता कामयाब हो जाए, अमेरिका अपनी नाकेबंदी समय पर हटा ले और 60 दिनों की परमाणु वार्ता में कोई बड़ी रुकावट न आए. कोई भी नया युद्ध या प्रतिबंध सब कुछ दोबारा पलट सकता है. इसीलिए हम कहते हैं कि समझौते ने एक नई उम्मीद दी है, लेकिन उम्मीद से कीमतें फौरन नहीं गिरतीं. उसके लिए सब्र चाहिए- शायद कुछ हफ्ते या कुछ महीने.

