18 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच जो 14-सूत्री समझौता हुआ, जिसमें सबसे अहम शर्त थी- ‘ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं खरीदेगा, न विकसित करेगा और न ही बनाएगा.’ ट्रंप ने इसे समझौते की ‘99.9%’ सबसे बड़ी कामयाबी बताया. लेकिन सवाल ये है कि अमेरिका ईरान को परमाणु देश बनने से रोकना क्यों चाहता है, क्या ईरान सच में अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ताकतवर देश बन सकता है…
अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना क्यों चाहता है?
अमेरिका की इस रुख के पीछे 5 बड़ी वजहें हैं:
- जंग की बड़ी वजह यही: ट्रंप ने कई बार कहा है कि ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना ही इस जंग की सबसे बड़ी वजह थी. 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो उसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना था. ट्रंप ने यह भी कहा कि यह समझौता ईरान के खिलाफ ‘दीवार’ बनाता है, ताकि वह कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके.
- 2015 के ओबामा समझौते से बेहतर समझौता: ट्रंप ने 2015 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) को ‘सड़क’ बताया था, जो ईरान को परमाणु बम तक ले जाती है. 2018 में उन्होंने उस समझौते से अमेरिका को वापस ले लिया था. अब वह अपने नाम से एक मजबूत समझौता करना चाहते हैं, जो ओबामा के समझौते से बेहतर हो और ईरान को परमाणु बम से हमेशा के लिए दूर रखे.
- ईरान की ‘दहलीज’ स्थिति को खत्म करना: जंग से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के मुताबिक, ईरान के पास 440.9 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम था, जो 10 परमाणु बम बनाने के लिए काफी है. ईरान इकलौता ऐसा देश है जिसने परमाणु बम बनाए बिना 60% तक यूरेनियम संवर्धित किया है. 60% से 90% (हथियार-ग्रेड) तक पहुंचने का फासला बहुत कम है और यही अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता है. अमेरिका चाहता है कि ईरान के पास मौजूद हाईली एनरिच्ड यूरेनियम को या तो देश से बाहर भेज दिया जाए, या नष्ट कर दिया जाए, या पतला कर दिया जाए.
- ईरान को ‘प्रॉक्सी युद्ध’ से रोकना: ट्रंप ने जंग की शुरुआत में कहा था कि उनकी एक और प्राथमिकता ईरान को क्षेत्र में हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी समूहों को फंड देने से रोकना है. परमाणु बम के साथ ईरान इन समूहों को और भी ज्यादा साहस और सुरक्षा दे सकता है.
- वैश्विक नेता वाली छवि बचाना: अगर ईरान अमेरिकी हमलों के बावजूद परमाणु बम बना लेता, तो यह अमेरिकी सैन्य ताकत की बड़ी नाकामी साबित होती. अमेरिका दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह अपने दुश्मनों को परमाणु हथियार हासिल करने से रोक सकता है.
क्या ईरान अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ताकतवर देश बन सकता है?
सीधा जवाब है नहीं. कम से कम आने वाले कुछ सालों में तो बिल्कुल नहीं. अमेरिका और ईरान की तुलना से समझते हैं:
| पैरामीटर्स | अमेरिका | ईरान |
| परमाणु हथियार | 5,042 | 0 (अभी) |
| सैन्य बजट (सालाना) | 1 ट्रिलियन डॉलर | 7.5 बिलियन डॉलर |
| एयरक्राफ्ट कैरियर | 11 | 0 |
| सैटेलाइट और टेक्नोलॉजी | दुनिया में सबसे आगे | सीमित |
| वैश्विक सैन्य ठिकाने | 800 से ज्यादा | 0 |
| अर्थव्यवस्था | 30.2 ट्रिलियन डॉलर | 356 बिलियन डॉलर |
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ईरान कभी अमेरिका को ‘पीछे’ नहीं छोड़ सकता, क्योंकि:
- अमेरिका के पास पहले से ही हजारों परमाणु हथियार हैं. ईरान को सिर्फ एक बम बनाने में भी महीनों लगेंगे.
- अमेरिका की सैन्य ताकत वायुसेना, नौसेना, उपग्रह, ड्रोन, और खुफिया नेटवर्क ईरान से कई गुना ज्यादा है.
- अमेरिका की GDP करीब 30.2 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि ईरान की GDP 356 बिलियन डॉलर (0.36 ट्रिलियन डॉलर) है. यानी अमेरिका की GDP ईरान से 86 गुना बड़ी है.
- अमेरिका के पास NATO, G7 और क्वाड जैसे मजबूत गठबंधन हैं. ईरान के पास सीमित सहयोगी (रूस, चीन से कुछ हद तक) हैं.
हालांकि, ईरान एक ‘क्षेत्रीय ताकत’ बन सकता है और यही अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता है. परमाणु हथियारों के साथ ईरान मिडिल ईस्ट में अपना दबदबा और मजबूत कर सकता है. इससे वह होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक रास्तों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर सकता है.
अमेरिका को सबसे बड़ा डर किस बात का है?
अमेरिका का सबसे बड़ा डर ईरान के परमाणु हथियार बनाने से नहीं, बल्कि नतीजों से है:
- क्षेत्रीय परमाणु होड़: अमेरिका को डर है कि ईरान के परमाणु बम बनाने के बाद सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र जैसे सभी मिडिल ईस्ट देश परमाणु हथियार बनाने की दौड़ में लग जाएंगे. इससे पूरा इलाका परमाणु संकट में बदल जाएगा.
- इजरायल के अस्तित्व का खतरा: ईरान के नेताओं ने बार-बार ‘इजरायल को नक्शे से मिटा देने’ की बात कही है. परमाणु हथियारों के साथ ये धमकियां भी हकीकत बन सकती हैं.
- होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का पूरा कब्जा: ईरान का असली हथियार होर्मुज स्ट्रेट है. परमाणु हथियारों के साथ ईरान इस रास्ते को किसी भी समय बंद कर सकता है. इससे दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छू जाएंगी.
- ‘पेट्रोडॉलर’ का खत्म होना: ईरान परमाणु ताकत बनकर तेल का व्यापार डॉलर की जगह युआन या रूबल में कर सकता है. इससे अमेरिकी डॉलर की साख कमजोर होगी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा.
- आतंकी समूहों को परमाणु हथियार: अमेरिका को डर है कि ईरान अपने परमाणु हथियारों की तकनीक हिजबुल्लाह, हमास या हौथी जैसे समूहों को न दे दे. इससे आतंकवाद और भी खतरनाक हो जाएगा.
- ‘वैश्विक नेता’ की छवि को झटका: जंग से पहले अमेरिका ने ईरान पर हमला किया ताकि उसका परमाणु कार्यक्रम खत्म हो जाए. लेकिन अगर ईरान फिर भी परमाणु हथियार बना लेता है, तो यह अमेरिकी सैन्य ताकत पर बड़ी चोट होगी.
क्या ये समझौता ईरान को परमाणु बम बनाने से रोक पाएगा?
ट्रंप ने खुद कहा कि अगर ईरान ने कोई शर्त तोड़ी, तो ‘हम वापस बम गिराने लौट आएंगे.’ विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटार्ड प्रोफेसर ए.के. पाशा के मुताबिक,
- इस समझौते में ईरान के मौजूदा 60% संवर्धित यूरेनियम के निपटान का कोई स्पष्ट समाधान नहीं है. यूरेनियम को पतला करने की बात तो है, लेकिन कब, कैसे और किस हद तक होगा, ये सवाल अभी अनसुलझे हैं.
- ईरान ने अपना मिसाइल प्रोग्राम समझौते से बाहर रखा है.
- ईरान का कहना है कि वह ‘यूरेनियम संवर्धन का अधिकार कभी नहीं छोड़ेगा.’
यानी ये समझौता ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने की गारंटी नहीं है. यह सिर्फ एक ‘मौका’ है. अगर 60 दिनों में अंतिम समझौता नहीं हुआ, तो फिर से जंग छिड़ सकती है. अगर ईरान ने चुपके से परमाणु हथियार बना लिए, तो अमेरिका के लिए ये सबसे बड़ी नाकामी साबित होगी.

