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खतरे में हैं ज्यादा कर्ज बांटने वाले बैंक? RBI ने दूर किया सबसे बड़ा डर

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पिछले कुछ समय में जमा रकम की तुलना में बैंकों के कर्ज बांटने की रफ्तार काफी ज्यादा हो गई है. इससे बैंकों के कर्ज-जमा अनुपात को लेकर चिंता बढ़ गई थी. लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट ने ये साफ किया है कि सिर्फ कर्ज-जमा अनुपात 80 फीसदी से ऊपर होने का मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि बैंक किसी बड़े खतरे में हैं.

आरबीआई के सितंबर 2026 के बुलेटिन में कर्ज-जमा अनुपात को लेकर काफी सारी जानकारी दी गई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023 से बैंक कर्ज की बढ़ोतरी कुल जमा की बढ़ोतरी से ज्यादा रही है. इसी वजह से कर्ज-जमा अनुपात 80 फीसदी से ऊपर पहुंचा है.  

अनुपात 80% से ऊपर क्यों पहुंचा?
कर्ज-जमा अनुपात देखकर ये पता किया जाता है कि बैंक के पास जमा हुए पैसे से कितना ज्यादा बैंक ने कर्ज दिया है. अगर किसी बैंक के पास ग्राहकों की जमा रकम 100 रुपए है और बैंक ने 80 रुपए का कर्ज दिया है, तो उसका कर्ज-जमा अनुपात 80 फीसदी हुआ. 

आरबीआई के मुताबिक, पिछले कुछ साल में बैंक कर्ज की मांग मजबूत रही है और कर्ज बढ़ने की रफ्तार जमा रकम से ज्यादा रही है. इसी वजह से ये अनुपात 80 फीसदी से ऊपर गया है. 

क्या बैंक के लिए खतरा है?
सिर्फ कर्ज-जमा अनुपात देखकर ये कहना सही नहीं होगा कि बैंक खतरे में हैं. आरबीआई के बुलेटिन के मुताबिक, ये अनुपात अकेले बैंकिंग व्यवस्था की वित्तीय कमजोरी या पैसे की कमी के जोखिम को मापने का सही पैमाना नहीं है. 

मतलब ये है कि अगर किसी बैंक का कर्ज-जमा अनुपात 80 फीसदी से ऊपर है तो इसका मतलब ये नहीं है कि बैंक के पास पैसे खत्म हो रहे हैं. 

बैंक जमा से ज्यादा कर्ज कैसे दे पाते हैं? 
आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में बैंकिंग व्यवस्था के खास पहलू की तरफ ध्यान दिलाया है. बैंक जब कर्ज देते हैं या निवेश करते हैं तो उसी प्रोसेस के दौरान जमा रकम भी पैदा हो सकती है. इसलिए ऐसा जरूरी नहीं है कि बैंक को हर बार पहले उतनी ही जमा रकम जुटानी पड़े, तभी वो कर्ज दे सके.  

हालांकि इसका मतलब ये भी नहीं है कि बैंक बिना किसी सीमा के कर्ज बांट सकते हैं. बैंक को अपनी कमाई, जोखिम, नियम को ध्यान में रखकर कर्ज देना होता है.

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