
Delhi and Jharkhand Gen Z: जेन जेड यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी, जिसके सुबह की शुरुआत इंस्टा पर रील्स स्क्रॉल करने से होती है. यह पीढ़ी सिर्फ रील्स देखने तक सीमित नहीं है. रील्स बनाकर समाज की कुरीतियों पर अपनी बात रखती है और कई बार कुछ सेकंड का वीडियो डिजिटल मूवमेंट का रूप ले लेता है.
इंफ्लुएंसर के तमगे के पीछे आलोचक और विचारक
देश के अलग-अलग सूबे में रहने वाली जेन जेड सोशल मीडिया को अपनी बात रखने के मंच की तरह इस्तेमाल करती है. यही वजह है कि इंफ्लुएंसर कहे जाने वाले कई युवा अपने कंटेंट में समाज, सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं.
दिल्ली और झारखंड की सड़कों पर दिखा फर्क
इस साल परीक्षा में अनियमितता को लेकर दिल्ली और झारखंड में हुए छात्र आंदोलनों ने दोनों जगह के युवाओं के मिजाज को समझने का एक मौका दिया. दिल्ली का जंतर-मंतर पहले से आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है, जबकि झारखंड के आंदोलन को व्यापक स्तर पर ध्यान मिला. दिल्ली में नीट यूजी से जुड़े प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा, वहीं झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी जैसी परीक्षाओं, रोजगार और पारदर्शिता से जुड़े सवाल युवाओं के आंदोलन का केंद्र रहे.
दिल्ली में सोशल मीडिया बना पर्सनल ब्रांड
दिल्ली के जेन जेड के सोशल मीडिया फीड में क्यूरेटेड एस्थेटिक्स, अच्छी लाइटिंग, पेस्टल वाइब्स, फैशन और कैफे कल्चर दिखाई देता है. सोशल मीडिया यहां कई युवाओं के लिए खुद को एक खास पहचान के साथ पेश करने का माध्यम भी है.
झारखंड में फिल्टर से ज्यादा जरूरी है असली जिंदगी
झारखंड के युवा अपने कंटेंट में ज्यादा ऑर्गेनिक नजर आते हैं. शहर की सड़क, गांव, खेत, बाजार और रोजमर्रा की जिंदगी के दृश्य बिना ज्यादा एडिटिंग के रील्स का हिस्सा बनते हैं. वहीं दिल्ली के युवाओं की डिजिटल भाषा पर ग्लोबल इंटरनेट ट्रेंड्स का असर साफ दिखाई देता है. हिंग्लिश, इंग्लिश मीम्स और नए इंटरनेट स्लैंग्स रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा हैं.
खोरठा, नागपुरी और संथाली से बनती अलग डिजिटल पहचान
झारखंड के युवा ग्लोबल इंटरनेट स्लैंग्स को स्थानीय भाषाओं और झारखंडी हिंदी के साथ मिलाकर इस्तेमाल करते हैं. इससे उनका डिजिटल कंटेंट स्थानीय जुड़ाव और अपनापन बनाए रखता है. वहीं दिल्ली का डिजिटल एक्टिविज्म जेंडर इक्वालिटी, क्लाइमेट चेंज, मेंटल हेल्थ, प्राइवेसी और दूसरे सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा केंद्रित दिखाई देता है.
रोजगार, परीक्षा की पारदर्शिता, सरकारी नीतियां और अधिकार
झारखंड के डिजिटल एक्टिविज्म के बड़े मुद्दे हैं. युवा सोशल मीडिया पर सवाल पूछने और जवाब मांगने के साथ आंदोलनों को भी डिजिटल पहुंच देते हैं. सोशल मीडिया की रीच में भी दोनों जगह अंतर नजर आता है. दिल्ली का युवा ट्रेंडिंग ऑडियो, हैशटैग और वायरल फॉर्मेट को तेजी से अपनाता है, जबकि झारखंड में जमीनी सक्रियता कई बार डिजिटल पहुंच से आगे निकल जाती है.
मीम और व्यंग्य से दिल्ली का विरोध
दिल्ली के प्रदर्शन स्थलों पर इंटरनेट मीम्स, ट्रेंडिंग लाइनें और रचनात्मक प्लेकार्ड आंदोलन की भाषा का हिस्सा बन जाते हैं. गंभीर मुद्दों को भी युवा व्यंग्य और डिजिटल संस्कृति के जरिए सामने रखते हैं.
नारे, ढोल और गीतों से झारखंड की आवाज
झारखंड के आंदोलनों में सीधे बैनर, पारंपरिक नारे, गीत और ढोल-नगाड़े दिखाई देते हैं. आंदोलन की यह शैली राज्य की जुझारू सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़ती है. वहीं K-Pop, हिप-हॉप, ट्रैप और इंडी-पॉप दिल्ली के युवा डिजिटल कल्चर का हिस्सा हैं. ग्लोबल स्तर पर ट्रेंड करने वाले गानों पर रील्स बनाना आम डिजिटल व्यवहार का हिस्सा बन चुका है. झारखंड का जेन जेड स्थानीय संगीत को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नई पहचान दे रहा है. नागपुरी डीजे बीट्स, संथाली रैप और खोरठा फ्यूजन स्थानीय संस्कृति को आधुनिक डिजिटल फॉर्मेट से जोड़ते हैं.
एक ही जेन जेड, लेकिन अलग सामाजिक जमीन
दोनों राज्यों के युवा इंटरनेट, रील्स और मीम कल्चर का हिस्सा हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकताओं में उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक जमीन की छाप दिखाई देती है. दिल्ली में सोशल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पर्सनल ब्रांडिंग, ग्लोबल ट्रेंड्स और डिजिटल एस्थेटिक्स से जुड़ा है. झारखंड में यही प्लेटफॉर्म रोजगार, परीक्षा, अधिकार, स्थानीय पहचान और सामाजिक सवालों को आवाज देने का माध्यम बनता दिखाई देता है.
दिल्ली और झारखंड की डिजिटल दुनिया यह बताती है कि जेन जेड कोई एक जैसी पीढ़ी नहीं है. एक ही स्क्रीन के सामने बैठी यह पीढ़ी अपने आसपास की दुनिया के हिसाब से अलग भाषा, अलग कंटेंट और अलग तरीके से अपनी आवाज बना रही है.
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