पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने शनिवार को चीन को भारत के लिए दीर्घकालिक और व्यापक चुनौती बताते हुए कहा कि सीमा विवाद के बावजूद दोनों देशों के रिश्तों को केवल सीमा के मुद्दे तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उत्तरी पड़ोसी के साथ सीमा विवाद अब भी अनसुलझा है और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) को लेकर भी दोनों देशों के बीच कोई साझा और स्पष्ट परिभाषा नहीं है। हालांकि, भारत और चीन के रिश्ते सिर्फ सीमा विवादों के बंधक नहीं हो सकते। नई दिल्ली को बीजिंग के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखने होंगे। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान को भी आने वाले समय में बड़ी सुरक्षा चुनौती बताया और चेताया कि हालिया रक्षा समझौतों से पैदा हुआ अति-आत्मविश्वास इस्लामाबाद को गलत आकलन की ओर ले जा सकता है। चौहान ने आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर से निपटने के लिए विश्वसनीय डिटरेंस, आत्मनिर्भरता और तीनों सेनाओं के बेहतर एकीकरण पर जोर दिया। उनके मुताबिक बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत को हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा।

‘सीमा पर स्थिरता के लिए सतर्कता और स्पष्ट समझौते जरूरी’
तीन मूर्ति भवन परिसर में ‘भारत की सुरक्षा के लिए खतरे और चुनौतियां’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए चौहान ने कहा कि सीमा पर स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्कता, भरोसेमंद क्षमताएं, स्पष्ट समझौते और उनका लगातार पालन जरूरी है। उनकी यह टिप्पणी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा के कुछ दिन बाद आई है। डोभाल ने वहां चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत की थी। वार्ता में सीमा के निर्धारण और सीमा-पार सहयोग से जुड़े मुद्दों पर आगे काम जारी रखने पर जोर दिया गया था। विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत के तहत हुई यह बैठक आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कुछ सप्ताह पहले हुई है। ब्रिक्स सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को प्रस्तावित है, जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना है। जनरल चौहान ने शनिवार के अखबार में प्रकाशित उस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें हॉटलाइन स्थापित करने और पूर्वोत्तर में कोर कमांडर स्तर की बातचीत शुरू करने की संभावना जताई गई थी। उन्होंने इसे स्वागत योग्य कदम बताया।
‘चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों जारी रखना होगा’
पूर्व CDS ने कहा कि भारत और चीन दोनों प्रमुख एशियाई शक्तियां, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सभ्यतागत देश हैं। दोनों देश एक-दूसरे के साथ सहयोग भी करते हैं और प्रतिस्पर्धा भी। क्षेत्रीय और वैश्विक व्यवस्था को लेकर दोनों की सोच कई मामलों में अलग है। ऐसे में चीन के साथ बातचीत जारी रखना भारत के हित में है। भारत और चीन शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और अब ब्रिक्स जैसे मंचों पर साथ काम कर रहे हैं। एशिया का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने साथ-साथ हो रहे आर्थिक और सामरिक उभार को किस तरह संभालते हैं।
‘वैश्विक अस्थिरता भारत के लिए बड़ी चुनौती’
जनरल चौहान ने पड़ोसी देशों में अस्थिरता को भी भारत की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल इस समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पुरानी वैश्विक व्यवस्थाएं और शक्ति-संतुलन कमजोर पड़ रहे हैं, जबकि नई व्यवस्था का ढांचा अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है। कुछ लोग मौजूदा स्थिति को ‘अव्यवस्था’ कहते हैं और यह अव्यवस्था लंबे समय तक बनी रह सकती है। ऐसे हालात भारत के लिए बड़ी चुनौती पैदा करेंगे। पूर्व CDS ने कहा कि बदलते वैश्विक माहौल में देशों के बीच गठबंधन भी स्थायी नहीं रह गए हैं। किसी देश को हमेशा के लिए दोस्त या दुश्मन मानना मुश्किल है। व्यापार में साझेदार कोई देश तकनीक के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी हो सकता है और एक क्षेत्र में सुरक्षा साझेदार की भूमिका निभाने वाला देश दूसरे क्षेत्र में अलग भूमिका में दिखाई दे सकता है।
‘शक्तिशाली देश नियमों की व्याख्या अपने हिसाब से करते हैं’
उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक और यूरेशिया जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में देशों के हित भी अलग हो सकते हैं। इन परिस्थितियों में बल प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय कानून आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे लागू करने का तरीका हर जगह एक जैसा नहीं है। शक्तिशाली देश अक्सर नियमों की व्याख्या अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से करते हैं। ऐसे दौर में भारत को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता कमजोरी को कम करती है।
‘पाकिस्तान अब भी बड़ी सुरक्षा चुनौती’
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच 7 अगस्त को हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ का उल्लेख करते हुए जनरल चौहान ने चेतावनी दी कि ऐसे समझौतों से पाकिस्तान में अत्यधिक आत्मविश्वास पैदा हो सकता है और इस्लामाबाद दोबारा किसी गलत आकलन का शिकार हो सकता है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान आने वाले समय में भी सुरक्षा के लिए एक बड़ी चिंता और खतरा बना रहेगा। ऑपरेशन सिंदूर, सिंधु जल संधि को कुछ समय के लिए रोकना और भारत द्वारा उठाए गए कुछ व्यावहारिक कदम उम्मीद है कि पाकिस्तान के व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं। हालांकि, हालिया रक्षा समझौतों से पैदा होने वाले अति-आत्मविश्वास पर भारत को सतर्क रहना होगा।
मक्का समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने की स्थिति को तीनों पर हमला माना जाएगा। यह समझौता पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच हुआ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने मक्का के अल-सफा पैलेस में संयुक्त रक्षा के लिए हुए शिखर सम्मेलन के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
‘ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं, सिर्फ रुका है’
जनरल चौहान ने कहा कि भारत के बाहरी सुरक्षा वातावरण में अनसुलझी सीमाएं, सीमा पार आतंकवाद, गैर-राज्य तत्व, विवादित क्षेत्र, ग्लोबल कॉमन्स और अंतरिक्ष, साइबर तथा समुद्री क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग और प्रतिस्पर्धा जैसे कई कारक शामिल हैं। इन चुनौतियों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि एक समग्र सुरक्षा दृष्टिकोण जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर, जिसमें तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और एकीकरण देखने को मिला था, पिछले साल मई में चलाया गया था, जब वह CDS थे। उनके मुताबिक यह अभियान 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए जानलेवा आतंकी हमले के जवाब में चलाया गया था और ऑपरेशन सिंदूर खत्म नहीं हुआ है, बल्कि फिलहाल रुका हुआ है। उन्होंने सेना से हमेशा अभियान के लिए तैयार रहने को कहा।
‘परमाणु हथियार और ‘स्टेबिलिटी-इनस्टेबिलिटी पैराडॉक्स”
पाकिस्तान के संदर्भ में पूर्व CDS ने कहा कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी ने दोनों देशों के बीच उच्चतम स्तर पर एक तरह की स्थिरता पैदा की है, लेकिन इसी वजह से निचले स्तर पर अस्थिरता की गुंजाइश बढ़ी है। इसे ‘स्टेबिलिटी-इनस्टेबिलिटी पैराडॉक्स’ कहा जाता है। पाकिस्तान की रणनीति यह रही है कि परमाणु हथियारों के कारण पारंपरिक सैन्य अभियानों की गुंजाइश कम हो जाए, जबकि आतंकवाद और सीमा पार गतिविधियों जैसे सब-कन्वेंशनल अभियानों के लिए जगह बढ़े। इस रणनीति में आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर प्रमुख रहे हैं। जनरल चौहान के अनुसार गैर-राज्य तत्व ऐसी स्थिति पैदा करते हैं, जिसमें जिम्मेदारी से इनकार किया जा सके, प्रत्यक्ष लागत कम रखी जा सके और राजनीतिक तथा सांप्रदायिक परिणाम पैदा किए जा सकें। किसी आतंकवादी नेटवर्क को कमजोर कर देने के बाद भी उसका समर्थन करने वाला इकोसिस्टम विचारधारा, भर्ती, धन, प्रशिक्षण, प्रचार और सरकारी समर्थन उसे दोबारा खड़ा कर सकता है।
‘भारत को विश्वसनीय डिटरेंस बनाए रखना होगा’
उन्होंने कहा कि आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर भारत के लिए बड़ी चुनौती बने रहेंगे। इनसे निपटने का रास्ता विश्वसनीय डिटरेंस तैयार करना है। उन्होंने उरी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने तीन सीमा-पार अभियानों के जरिए यह दिखाया है कि डिटरेंस हर स्तर पर प्रभावी होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को पाकिस्तान के लिए छद्म युद्ध और आतंकवाद की लागत बढ़ानी होगी, ताकि वह इसे अपनी सरकारी नीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना बंद करे।
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‘भविष्य के युद्ध में तकनीक और एकीकरण निर्णायक’
भविष्य के युद्धों के बारे में जनरल चौहान ने कहा कि आने वाला समय उन ताकतों का होगा जो अपने विरोधियों से तेज सीखेंगी और तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल सकेंगी। भारत को जमीन, समुद्र और हवा के साथ-साथ साइबर, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम, भौतिक, कॉग्निटिव और सिंथेटिक डोमेन में भी मजबूत होना होगा। उन्होंने कहा कि तकनीक संगठनात्मक सीमाओं को नौकरशाही की तुलना में कहीं तेजी से खत्म कर रही है। इसलिए सभी क्षेत्रों में सेंसर, निर्णय लेने वाले तंत्र और हथियार प्रणालियां आपस में जुड़ी होनी चाहिए। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं का प्रदर्शन बेहतर रहा, क्योंकि उनके पास युद्धक्षेत्र की बेहतर जानकारी थी और परिस्थितियों की समझ अधिक स्पष्ट थी। इससे सेना तेजी से और बेहतर निर्णय ले सकी। भविष्य में ऐसी सेवाएं और क्षेत्र महत्वपूर्ण होंगे जो साझा ऑपरेशनल तस्वीर और मजबूत नेटवर्क से जुड़े हों।

