क्या नेपाल कुदरत का कोई ‘फेवरेट टारगेट’ बन गया है? 25 अप्रैल 2015 को धरती के कंपन ने नेपाल को हिलाकर रख दिया था. लोगों को लगा कि यह एक सदी की सबसे बड़ी तबाही थी, लेकिन देश को इसके बाद लगातार एक के बाद एक आपदा झेलनी पड़ी. 2024 में काठमांडू घाटी की भीषण बाढ़, 2025 में ग्लेशियल झील का फटना और ताजा तबाही 26 अगस्त 2026 में भोटेकोशी नदी में आई वह भयानक बाढ़. इसमें अब तक 165 से ज्यादा शव मिले हैं और 400 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं. आखिर आपदाओं को नेपाल से ऐसा क्या लगाव है…
नेपाल क्यों है आपदाओं का ‘पसंदीदा देश’?
नेपाल में आपदाएं इसलिए आती हैं क्योंकि कई खतरे एक साथ एक ही जगह मिल जाते हैं. यानी, यह सिर्फ एक वजह नहीं, बल्कि कई वजहों का खतरनाक संगम है. टकराती हुई टेक्टोनिक प्लेटें, बेहद ऊंचे-ऊंचे पहाड़, तीखी ढलानें, तेज बारिश, पिघलते ग्लेशियर और इन सबके बीच बसी हुई बस्तियां. इसे समझने के लिए हम इन वजहों को 5 बड़े हिस्सों में बांट सकते हैं.
1. प्लेटों की जंग भूकंप की असल वजह
नेपाल भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव वाली सीमा पर बसा है. ये दोनों प्लेटें एक-दूसरे में हर साल करीब 5 सेंटिमीटर तक घुस रही हैं. इस टकराव से जबरदस्त दबाव बनता है. यह दबाव अचानक रिलीज होता है, तो भूकंप आता है.

यही वजह है कि हिमालय का यह इलाका दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप-प्रभावित क्षेत्रों में से एक है. 2015 का 7.8 तीव्रता का गोरखा भूकंप इसी टकराव का नतीजा था. इसमें करीब 9,000 लोग मारे गए और हजारों भूस्खलन का शिकार हुए.
25 अप्रैल 2015 को आए 7.8 तीव्रता के गोरखा भूकंप का सीधा कारण यही प्लेटों का टकराव था. इसमें लगभग 9,000 लोग मारे गए थे.
भूकंप सिर्फ झटके ही नहीं देता, बल्कि यह हजारों भूस्खलन और हिमस्खलन को भी ट्रिगर करता है. 2015 के भूकंप ने हिमालय के पहाड़ों की चट्टानों को ढीला कर दिया था. इससे आने वाले सालों में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया.
2. बाढ़ और भूस्खलन की वजह पहाड़ों का जाल
नेपाल की भौगोलिक बनावट ही उसे बाढ़ और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील बनाती है. यहां दक्षिण में तेराई का मैदान है. उत्तर में माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) है. यानी सिर्फ 150-250 किलोमीटर की दूरी में इतनी ऊंचाई का फर्क दिखता है. इस तीखी ढलान पर पानी और मलबा बहुत तेजी से नीचे आता है.
इसके अलावा नेपाल में 6,000 से ज्यादा नदियां हैं. ये नदियां संकरी और गहरी घाटियों से होकर बहती हैं. जब अचानक भारी बारिश होती है या ग्लेशियर फटता है, तो पानी की बहुत बड़ी मात्रा इन संकरी घाटियों में घुसती है और बाढ़ का रूप ले लेती है.
26 अगस्त 2026 को भोटेकोशी-ल्हेंडे खोला नदी में आई भीषण बाढ़ इसी का नतीजा थी. इसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों लापता हैं.
3. जलवायु परिवर्तन के कहर से पिघलते ग्लेशियर
नेपाल की आपदाओं में जलवायु परिवर्तन एक नया और बहुत खतरनाक चैप्टर जोड़ रहा है:
- तेजी से पिघलते ग्लेशियर: हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर 2000 के बाद से दोगुनी हुई है. इससे अनगिनत ग्लेशियल झीलें (बर्फ पिघलने से बनी झीलें) बन गई हैं, जो बेहद अस्थिर हैं.
- ग्लेशियल झील विस्फोट (GLOF): जब ये झीलें अचानक फटती हैं, तो भारी मात्रा में पानी, बर्फ और चट्टानें नीचे की ओर उफान मारती हैं. इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहते हैं.
- हिमस्खलन: बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के बड़े-बड़े हिस्से टूटकर नीचे गिर सकते हैं. 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ का कारण भी लगभग 600 मीटर चौड़े बर्फ के विशाल टुकड़े का 1,200 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई से गिरना माना जा रहा है.
2026 की बाढ़ के पीछे भी बर्फ-चट्टान का हिमस्खलन और ग्लेशियर का टूटना बताया जा रहा है. यानी पिघलता ग्लेशियर और अस्थिर ढलान मिलकर एक घातक संयोजन बना रहे हैं.
4. बेमौसम और बहुत ज्यादा बारिश
नेपाल में भारी मानसूनी बारिश होती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसे और भी अनियमित और चरम बना दिया है. 2024 में आई भीषण बाढ़ के पीछे अत्यधिक और केंद्रित मानसूनी वर्षा को एक प्रमुख कारण बताया गया.
कभी-कभी बिना बारिश के भी ग्लेशियर फटने या हिमस्खलन से बाढ़ आ जाती है. इससे पारंपरिक चेतावनी प्रणालियां बेअसर हो जाती हैं. 2026 की बाढ़ इसका ताजा उदाहरण है, जो बिना बारिश के ही आई.
5. बस्तियां और विकास बनीं इंसानी गलतियां
प्राकृतिक कारणों के अलावा मानवीय गतिविधियां भी इस भयावहता को बढ़ाती हैं. 1990-2020 के बीच काठमांडू में 386% की बढ़ोतरी के साथ तेजी से शहरीकरण हुआ. अत्यधिक वनों की कटाई की वजह से 1989-2019 के बीच 28% जंगल कम हो गया. प्राकृतिक खतरे तब आपदा बनते हैं, जब वे इंसानों, घरों और बुनियादी ढांचे को प्रभावित करते हैं:
- नेपाल में सड़कें, पुल, स्कूल, अस्पताल और बिजली परियोजनाएं अक्सर खतरनाक इलाकों में बनी हैं.
- संकरी घाटियों में बस्तियां होने से बाढ़ या भूस्खलन का असर और भी भयानक हो जाता है.
- सड़क निर्माण, जंगलों की कटाई और बिना योजना के विकास से पहाड़ी ढलान और अस्थिर हो जाती हैं.
- नदी के किनारों पर अतिक्रमण और खराब गुणवत्ता वाले इमारती निर्माण भी जिम्मेदार हैं.

