ईरान जंग के बीच, भारत ने अमेरिका से एक बार फिर 2 MQ-9 सी गार्डियन ड्रोन को लीज पर लेने का करार किया है. वर्ष 2020 से भारतीय नौसेना लीज पर लेकर इन हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (HALI) रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम (RPAS) के जरिए हिंद महासागर की रखवाली कर रही है. हालांकि, ईरान का दावा है कि मिडिल-ईस्ट जंग में अमेरिका के 40 से ज्यादा ऐसे एमक्यू-9 ड्रोन को मार गिराया गया है.
सोमवार (17 अगस्त) को भारत के रक्षा मंत्रालय और एमक्यू-9 ड्रोन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी, जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स के बीच राजधानी दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में ये करार हुआ. अगले 30 महीने तक भारतीय नौसेना लीज (पट्टे) पर लिए इन एमक्यू-9बी ड्रोन्स को ऑपरेट करेगी. इस सौदे की कुल कीमत 1943 करोड़ है.
रक्षा मंत्रालय का क्या कहना?
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, एडवांस सिस्टम, हाई-टेक सेंसर और पेलोड से लैस एमक्यू-9बी सी गार्डियन, भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा. ये आरपीएएस, समुद्री क्षेत्र के विशाल क्षेत्र में लगातार खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही कवरेज प्रदान करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाले घटनाक्रमों पर नजर रखने और प्रतिक्रिया देने की भारत की क्षमता मजबूत होगी. गौरतलब है कि अक्टूबर 2024 में भारत ने जनरल एटॉमिक्स से 31 एमक्यू-9बी प्रीडेटर ड्रोन लेने का करार किया था. इस सौदे की कुल कीमत 3.5 बिलियन डॉलर यानी लगभग 34 हजार करोड़ थी. इस सौदे में एमक्यू-9बी के साथ मिसाइल और दूसरे हथियार भी शामिल थे.
MQ-9 रीपर ड्रोन की खासियत
एमक्यू-9 रीपर ड्रोन दुनिया के बेहतरीन रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम में से एक है, जिसका इस्तेमाल अमेरिकी सेना सहित कई नाटो देश करते हैं. एमक्यू-9 रीपर ड्रोन के आर्म्ड वर्जन यानि कॉम्बैट वर्जन को प्रीडेटर के नाम से जाना जाता है. लेकिन भारत को जो एमक्यू-9 मिलने जा रहे हैं वो अलग तरह के हैं. भारत को एमक्यू-9 के दो वेरिएंट मिलने जा रहे हैं. ये दो वेरिएंट हैं–स्काई-गार्डियन और सी-गार्डियन.
थलसेना यानि भारतीय सेना और वायुसेना को मिलेंगे स्काई-गार्डियन. भारतीय नौसेना को मिलेंगे सी-गार्डियन. इसके मायने ये हुए कि जमीन और आसमान की निगहबानी के लिए स्काई-गार्डियन और समंदर में नजर रखने के लिए सी-गार्डियन. लेकिन अभी तक इन ड्रोन्स की सप्लाई शुरु नहीं हुई है. माना जा रहा है कि ईरान जंग इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.
US से 31 MQ-9 ड्रोन लेगा भारत
जानकारी के मुताबिक, अमेरिका से भारत कुल 31 एमक्यू-9 ड्रोन लेने जा रहा है. लेकिन ये डील किस्तों में होगी. यानि पहली खेप में 10 ड्रोन लिए जाएंगे, बाकी उसके बाद. कुल 31 ड्रोन में से 15 ड्रोन जो होंगे नौसेना को मिलेंगे यानि 15 सी-गार्डियन इंडियन नेवी को मिलेंगे. इसी तरह से 16 स्काई गार्डियन जो भारत अमेरिका से लेने जा रहा है उसमें से 8-8 थलसेना और वायुसेना को मिलेंगे. यानी एलएसी से लेकर हिंद महासागर में चीन की हर हरकत पर ये एमक्यू-9 रखेंगे पैनी नजर.
ये एमक्यू-9 कोई साधारण क्वॉडकॉप्टर नहीं हैं, बल्कि किसी फाइटर जेट की ही तरह बड़े ड्रोन होते हैं. इसीलिए इन्हें रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम का नाम भी दिया जाता है. इन एयरक्राफ्ट में पायलट, कॉकपिट में बैठकर आसमान में उड़ान नहीं भरता है बल्कि जमीन पर रहकर इन्हें रिमोट से फ्लाई करता है या ऑपरेट करता है. इन एमक्यू-9 ड्रोन की लंबाई 36 फीट होती है और इनका विंगस्पैन यानि चौड़ाई करीब-करीब 80 फीट की होती है.
ये एमक्यू-9 ड्रोन मल्टी रोल-मल्टी मिशन आरपीएएस सिस्टम होते हैं. यानि एक एयरक्राफ्ट कई तरह के रोल अपना सकता है और अलग-अलग तरह के ऑपरेशन भी कर सकते हैं. जैसा कि सी-गार्डियन ड्रोन है जो एंटी-सरफेस यानि दुश्मन के युद्धपोत को भी मिसाइल से मार गिराने में सक्षम है तो समंदर के कई सौ फीट नीचे ओपरेट कर रही पनडुब्बी को भी तबाह कर सकता है यानी एंटी-सबमरीन ऑपरेशन भी कर सकता है. ये हेल तकनीक यानि हाई ऑल्टिट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस ड्रोन होते हैं. ये 40-50 हजार फीट की ऊंचाई पर 30-30 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं.
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ईरान जंग में US की MQ-9 ड्रोन फ्लीट को नुकसान
ईरान जंग के दौरान हालांकि अमेरिका की एमक्यू-9 ड्रोन की फ्लीट को जबरदस्त नुकसान हुआ. ईरान का दावा है कि पिछले पांच महीने में यानी जब से अमेरिका-ईरान जंग शुरु हुई है, तब से 40 से ज्यादा ऐसे ड्रोन गिराए जा चुके हैं. अमेरिका ने इन ड्रोन्स का इस्तेमाल, होर्मुज स्ट्रेट में ईरानी नौसेना (और आईआरजीसी-नेवी) की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल किया था. ईरान का दावा है कि जंग के दौरान अमेरिका की एमक्यू-9 फ्लीट की एक चौथाई ताकत खत्म हो चुकी है. एमक्यू-9 के बड़े संख्या में गिरने से अमेरिका की राजनीति में भूचाल आ गया है और ट्रंप प्रशासन को जबरदस्त आलोचना झेलनी पड़ी है.
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