अमेरिका में नौकरी का सपना देख रहे लाखों भारतीयों के लिए बड़ी खबर है। ट्रंप प्रशासन ने H-1B और PERM वीजा में कथित धोखाधड़ी के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी जांच शुरू कर दी है। इस कार्रवाई के दायरे में आईटी कंपनियों से लेकर अस्पतालों तक कई संस्थान आ गए हैं, जिससे भारतीय आईटी सेक्टर पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
ट्रंप प्रशासन ने क्यों शुरू की जांच?
अमेरिकी श्रम विभाग के महानिरीक्षक एंथनी डी’एस्पोसिटो के अनुसार, विदेशी श्रमिक कार्यक्रमों में कथित धोखाधड़ी और दुरुपयोग को लेकर बड़े पैमाने पर जांच शुरू की गई है। अधिकारियों का कहना है कि व्हिसलब्लोअर्स यानी मुखबिर से मिली शिकायतों के बाद कई मामलों में समन जारी किए गए हैं।
जांच के दायरे में कौन-कौन?
- कॉग्निजेंट जैसी कुछ बड़ी आईटी कंपनियां भी जांच के घेरे में हैं।
- अस्पताल, डॉक्टरों के क्लीनिक और नर्सिंग होम भी रडार पर हैं।
- जांच एजेंसियां श्रम तस्करी और वीजा नियमों के कथित दुरुपयोग की पड़ताल कर रही हैं।
- कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क और इलिनोय जैसे राज्यों पर विशेष फोकस रखा गया है।
क्या-क्या आरोप लगाए गए हैं?
जांच एजेंसियों का दावा है कि कुछ मामलों में विदेशी श्रमिक कार्यक्रमों का इस्तेमाल गलत तरीके से किया गया। अधिकारियों का यह भी कहना है कि कुछ मामलों में ऐसे नेटवर्क की जांच की जा रही है जिनका संबंध श्रम तस्करी या अन्य आपराधिक गतिविधियों से हो सकता है। हालांकि, सभी मामलों में जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।
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क्या भारतीयों पर भी होगा असर?
H-1B वीजा का सबसे अधिक लाभ भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलता है। यदि जांच के बाद नियम और सख्त किए जाते हैं या कंपनियों पर कड़ी निगरानी बढ़ती है, तो:-
- H-1B और PERM वीजा की जांच प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
- कंपनियों को भर्ती में अतिरिक्त दस्तावेज देने पड़ सकते हैं।
- वीजा आवेदन की स्क्रूटनी बढ़ सकती है।
- नियमों का पालन करने वाले योग्य आवेदकों के लिए वीजा कार्यक्रम बंद होने का कोई संकेत फिलहाल नहीं है।
क्या H-1B वीजा बंद हो जाएगा?
फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक एलान नहीं हुआ है कि H-1B या PERM वीजा कार्यक्रम बंद किया जाएगा। मौजूदा कार्रवाई का फोकस कथित धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज और नियमों के दुरुपयोग पर है, न कि पूरे वीजा कार्यक्रम को समाप्त करने पर।
