प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी बीजू पटनायक को याद किया। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया की आजादी की लड़ाई में बीजू पटनायक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने उस साहसिक अभियान का जिक्र किया, जिसमें बीजू पटनायक ने इंडोनेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुतन स्याहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता को सुरक्षित भारत पहुंचाया था।

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कैसे शुरू हुई यह कहानी?
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद 1945 में जापान ने इंडोनेशिया पर अपना कब्जा छोड़ दिया। इसके तुरंत बाद 17 अगस्त 1945 को राष्ट्रपति सुकर्णो के नेतृत्व में इंडोनेशिया ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन नीदरलैंड (डच शासन) ने दोबारा इंडोनेशिया पर कब्जा करने की कोशिश शुरू कर दी। डच सेना ने इंडोनेशियाई नेताओं पर कार्रवाई करते हुए प्रधानमंत्री सुतन स्याहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता समेत कई नेताओं को नजरबंद कर दिया। देश से बाहर जाने के सभी रास्तों पर भी कड़ी निगरानी लगा दी गई, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को दबाया जा सके।
नेहरू ने बीजू पटनायक को सौंपी थी बड़ी जिम्मेदारी
जुलाई 1947 में भारत की अंतरिम सरकार के प्रमुख जवाहरलाल नेहरू ने उस समय 31 वर्षीय पायलट बीजू पटनायक को एक बेहद जोखिम भरा मिशन सौंपा। उद्देश्य था इंडोनेशिया के शीर्ष नेताओं को सुरक्षित बाहर निकालकर भारत लाना, ताकि वे दुनिया के सामने डच शासन की कार्रवाई को उजागर कर सकें और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा सकें।
पत्नी के साथ उड़ाया था डकोटा विमान
बीजू पटनायक अपनी पत्नी और सह-पायलट ज्ञानवती पटनायक के साथ डगलस सी-47 ‘डकोटा’ सैन्य विमान लेकर भारत से इंडोनेशिया पहुंचे। डच सरकार ने उनके विमान को मार गिराने की चेतावनी दी थी। इसके जवाब में बीजू पटनायक ने भी साफ संदेश दिया कि यदि उनके विमान पर हमला हुआ तो भारतीय हवाई क्षेत्र में डच विमानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जकार्ता के पास एक अस्थायी हवाई पट्टी पर विमान उतारा। वहां से प्रधानमंत्री सुतन स्याहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता को सुरक्षित विमान में बैठाकर पहले सिंगापुर और फिर 24 जुलाई 1947 को नई दिल्ली ले आए। यहां दोनों नेताओं ने जवाहरलाल नेहरू के साथ महत्वपूर्ण और गोपनीय बैठकें कीं।
दुनिया के सामने पहुंचा इंडोनेशिया का मुद्दा
इस साहसिक अभियान के बाद इंडोनेशिया की आजादी की लड़ाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में भी इंडोनेशिया की स्वतंत्रता का जोरदार समर्थन किया। बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद आखिरकार 27 दिसंबर 1949 को नीदरलैंड ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी।
इंडोनेशिया ने दिया सर्वोच्च सम्मान
इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक के इस ऐतिहासिक योगदान को कभी नहीं भुलाया। उन्हें मानद इंडोनेशियाई नागरिकता प्रदान की गई और ‘भूमि पुत्र’ सम्मान से भी नवाजा गया। यह सम्मान किसी विदेशी नागरिक को बहुत कम दिया जाता है और इसे इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मानों में गिना जाता है।
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पीएम मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया की संसद में कहा कि भारत और इंडोनेशिया लगभग एक ही समय स्वतंत्र हुए थे। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इंडोनेशिया की आजादी का मजबूती से समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बीजू पटनायक ने जिस साहस के साथ प्रधानमंत्री सुतन स्याहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता को सुरक्षित भारत पहुंचाया, उससे दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत हुए। हालांकि, इस पूरे अभियान की योजना बनाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का उन्होंने अपने संबोधन में जिक्र नहीं किया।
VIDEO | Jakarta: Addressing the Indonesian Parliament, PM Modi (@narendramodi) says, “There is so much that our ancestors experienced together. Both our nations endured long periods of foreign rule. We gained our independence at almost the same time, Indonesia in 1945 and India… pic.twitter.com/TMpSGNpyH1
— Press Trust of India (@PTI_News) July 7, 2026
