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Report:पाकिस्तान से लौटते समय इस्राइल के निशाने पर थे ईरानी वार्ताकार, अमेरिका ने कैसे बचाई दोनों की जान? – Why The Us Allegedly Shielded Irans Top Negotiators From An Israeli Assassination Plot During Ceasefire Talks

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अमेरिका और इस्राइल के रिश्ते भले ही बेहद करीबी माने जाते हों, लेकिन ईरान युद्ध के दौरान दोनों देशों की रणनीति हर मोर्चे पर एक जैसी नहीं थी। एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने सहयोगी देशों के जरिए ईरान को इस्राइल की एक कथित हत्या की साजिश के बारे में आगाह किया था। दावा है कि इस्राइल युद्धविराम वार्ता में शामिल ईरान के दो प्रमुख नेताओं को निशाना बना सकता था। अमेरिका को आशंका थी कि ऐसा होने पर युद्धविराम की पूरी प्रक्रिया टूट जाएगी और क्षेत्र एक बार फिर बड़े युद्ध की चपेट में आ जाएगा।

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालीबाफ युद्धविराम और आगे की वार्ता में सबसे अहम भूमिका निभा रहे थे। यही दोनों नेता अमेरिका, कतर, पाकिस्तान और क्षेत्र के अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहे थे। इन चर्चाओं का मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत का ढांचा तैयार करना था। ऐसे में अमेरिका नहीं चाहता था कि वार्ता के बीच इन नेताओं पर कोई हमला हो और पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया पटरी से उतर जाए।

क्या थी अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता?

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका को जानकारी मिली थी कि इस्राइल ने गालीबाफ और अराघची को संभावित निशानों की सूची में रखा है। ट्रंप प्रशासन का मानना था कि अगर इन दोनों नेताओं की हत्या होती है तो ईरान के साथ किसी भी तरह के शांति प्रयास खत्म हो जाएंगे। इसी वजह से अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के माध्यम से ईरान को सतर्क किया और इस्राइल से भी संयम बरतने का आग्रह किया। अमेरिका का मानना था कि बातचीत जारी रखना युद्ध को आगे बढ़ाने से बेहतर विकल्प है।

इस्राइल ने कब-कब निशाना बनाने की कोशिश की


  • रिपोर्ट के अनुसार, गालीबाफ 2025 के 12 दिन के युद्ध और इस साल के संघर्ष में दो बार हमले का लक्ष्य बने, लेकिन दोनों बार बच गए।

  • अप्रैल में इस्लामाबाद वार्ता के बाद ईरानी सांसद मोहसिन जंगानेह ने कहा कि वार्ताकारों ने गंभीर सुरक्षा खतरे के बावजूद बातचीत जारी रखी।

  • ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को पाकिस्तान की सीमा से इस्लामाबाद तक पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने सुरक्षा प्रदान की।

  • वापसी के दौरान कथित सुरक्षा खतरे के कारण विमान की मशहद में आपात लैंडिंग कराई गई और प्रतिनिधिमंडल सड़क मार्ग से तेहरान पहुंचा।

  • सुरक्षा खतरों के बावजूद अराघची और गालीबाफ ने बाद में कतर, स्विट्जरलैंड और भारत सहित कई देशों की कूटनीतिक यात्राएं जारी रखीं।

क्या इस्राइल की रणनीति अलग थी?

रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद इस्राइल की प्राथमिकता ईरान के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को निशाना बनाना थी। दावा किया गया है कि वर्षों में ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत ऐसे हमलों में हुई। रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइल चाहता था कि ईरान के मौजूदा सत्ता ढांचे को कमजोर किया जाए और नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता बने। यही वजह थी कि बातचीत में शामिल अपेक्षाकृत व्यावहारिक नेताओं पर भी खतरा बना रहा। अमेरिका की सोच इससे अलग थी। वह सैन्य दबाव के साथ-साथ बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकालने की कोशिश कर रहा था।

क्यों अहम थे अराघची और गालिबाफ?

अब्बास अराघची और मोहम्मद बाघेर गालीबाफ ईरान की वार्ता टीम के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल थे। दोनों क्षेत्रीय देशों के साथ लगातार संपर्क में थे और युद्धविराम लागू कराने की कोशिशों का नेतृत्व कर रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में भी इन दोनों के इस्राइल के निशाने पर होने की जानकारी सामने आई थी। बाद में अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद कथित तौर पर इस्राइल ने तत्काल कार्रवाई नहीं की। यही कारण था कि इन दोनों नेताओं की सुरक्षा को लेकर ईरान ने भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी।

क्या ईरान ने सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी थी?

रिपोर्ट के अनुसार, संभावित हमलों की आशंका के बाद ईरान ने अपने शीर्ष नेताओं की सुरक्षा और यात्रा व्यवस्था पूरी तरह बदल दी। जब अराघची और गालीबाफ पाकिस्तान में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मुलाकात के लिए गए तो ईरान ने पाकिस्तान और कतर के माध्यम से अमेरिका से यह भरोसा मांगा कि इस्राइल प्रतिनिधिमंडल को निशाना नहीं बनाएगा। बताया गया कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को पाकिस्तान की सीमा से इस्लामाबाद तक लड़ाकू विमानों की सुरक्षा मिली। वापसी के दौरान सुरक्षा खतरे की सूचना मिलने पर विमान को ईरान के मशहद हवाई अड्डे पर आपात स्थिति में उतारा गया। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल सड़क मार्ग से करीब आठ घंटे का सफर तय कर तेहरान पहुंचा।

क्या इसके बाद भी बातचीत जारी रही?

इन सुरक्षा खतरों के बावजूद दोनों नेता कूटनीतिक प्रयासों में सक्रिय रहे। रिपोर्ट के मुताबिक, मई में दोनों कतर गए और जून में स्विट्जरलैंड में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ एक और बैठक में शामिल हुए। इसी दौरान अराघची ने ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत का भी दौरा किया। इससे संकेत मिला कि सुरक्षा खतरे के बावजूद ईरान बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहता था। वहीं अमेरिका भी युद्ध को लंबा खींचने के बजाय किसी अंतरिम समझौते तक पहुंचने की कोशिश करता रहा।

क्या अमेरिका और इस्राइल के लक्ष्य अलग हो गए थे?

रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका और इस्राइल एक साथ काम कर रहे थे, लेकिन बाद में दोनों की प्राथमिकताएं अलग दिखने लगीं। अमेरिका चाहता था कि संघर्ष को रोककर बातचीत आगे बढ़ाई जाए, जबकि इस्राइल ईरान की सैन्य क्षमता, मिसाइल कार्यक्रम और मौजूदा शासन पर अधिक दबाव बनाए रखना चाहता था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस्राइल को आशंका थी कि जल्द युद्धविराम होने से ईरान आर्थिक रूप से संभल जाएगा और भविष्य में अपनी सैन्य तथा परमाणु क्षमताओं को फिर मजबूत कर सकता है। यही वजह थी कि दोनों देशों की रणनीति में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया।

पूरी रिपोर्ट यह संकेत देती है कि युद्ध के दौरान केवल सैन्य कार्रवाई ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी कई समानांतर प्रयास चल रहे थे। एक तरफ इस्राइल अपने सुरक्षा उद्देश्यों को पूरा करना चाहता था, जबकि दूसरी ओर अमेरिका क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने और युद्धविराम को सफल बनाने पर जोर दे रहा था। हालांकि इन दावों पर संबंधित देशों की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन यदि रिपोर्ट सही साबित होती है तो यह पश्चिम एशिया में अमेरिका और इस्राइल की रणनीतिक सोच के अंतर को भी उजागर करती है।

 

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