ईरान के खिलाफ जारी तनाव के बीच इजरायल ने बड़ा दावा किया है. इजरायली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा कि इजरायल ऐसी स्पेस लेजर टेक्नीक पर काम कर रहा है, जिससे स्पेस में अटैक करने की क्षमता विकसित की जा सके. मिलिट्री रिपोर्टर्स के साथ बातचीत में इजराइल कैट्ज़ ने कहा कि प्रधानमंत्री और उन्होंने कुछ बड़े लक्ष्य तय किए हैं. इनमें सबसे जरूरी टारगेट यह है कि देश के सबसे बेहतर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा जाए. उनका कहना था कि फिलहाल दुनिया के किसी भी देश के पास अंतरिक्ष में सीधे हमला करने की पूरी क्षमता नहीं है, लेकिन इजरायल इस क्षेत्र में सबसे आगे रहना चाहता है.
विदेशी रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्पेस लेजर तकनीक का इस्तेमाल दुश्मन के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाने या नष्ट करने के लिए किया जा सकता है. इसके अलावा, अंतरिक्ष में हमलों के बाद बनने वाले मलबे को खत्म करने में भी इसका इस्तेमाल संभव माना जा रहा है. ऐसी भी चर्चा है कि इजरायल के पास पहले से ही एरो 3 मिसाइल सिस्टम के जरिए दुश्मन के सैटेलाइट को निशाना बनाने की क्षमता हो सकती है. यह सिस्टम फिलहाल अंतरिक्ष में बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
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कई बड़े देश स्पेस वॉरफेयर तकनीक कर रहे काम
दुनिया के कई बड़े देश अब स्पेस वॉरफेयर तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं. रूस और चीन को पहले से अंतरिक्ष में मलबे और सैटेलाइट तकनीक का अनुभव माना जाता है. इसी वजह से कई देश अब नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं. इनमें सैटेलाइट को जाम करना, कंट्रोल रोकना, नुकसान पहुंचाना या लेजर की मदद से निष्क्रिय करना शामिल है. इजरायल का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब दुनिया में स्पेस सिक्योरिटी और अंतरिक्ष हथियारों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है.
स्पेस लेजर वेपन क्या है?
स्पेस लेजर वेपन एक डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन है, जिसे ऑर्बिट में या स्पेसक्राफ्ट पर रखा जाता है, जिसे कंसन्ट्रेटेड लेज़र एनर्जी का इस्तेमाल करके टारगेट को डिसेबल, डैमेज या तबाह करने के लिए डिजाइन किया गया है. इन टारगेट में सैटेलाइट, मिसाइल, ड्रोन, एयरक्राफ्ट या ग्राउंड सिस्टम शामिल हो सकते हैं. अभी तक किसी भी देश ने ऑफिशियली पूरी तरह से ऑपरेशनल अटैकिंग स्पेस लेजर वेपन तैनात नहीं किया है, लेकिन यूनाइटेड स्टेट्स, चीन और रूस जैसे देश एक्टिवली इससे जुड़ी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रहे हैं.स्पेस में लेजर थ्योरी के हिसाब से बहुत लंबी दूरी तय कर सकते हैं क्योंकि बीम को कमजोर करने के लिए कोई एटमॉस्फियर नहीं होता है. बीम क्वालिटी, टारगेट साइज और ट्रैकिंग एक्यूरेसी के आधार पर असरदार कॉम्बैट रेंज कुछ 100 किलोमीटर से लेकर कई हजार किलोमीटर तक हो सकती है.
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