दुनिया भर में इस बात को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ऑटोमेशन के बढ़ते दौर में सेना के जनरलों और एडमिरलों की भूमिका खत्म हो जाएगी? क्या भविष्य के युद्ध पूरी तरह मशीनें लड़ेंगी? दुनिया की सबसे उन्नत रक्षा और ड्रोन तकनीक बनाने वाली कंपनी ‘जनरल एटॉमिक्स’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. विवेक लाल ने अमर उजाला के विशेष पॉडकास्ट ‘अनम्यूट भारत’ में इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि युद्ध के मैदान में एआई की स्वायत्तता चाहे जितनी बढ़ जाए, विनाशकारी और अहम फैसले पूरी तरह मशीनों के हाथ में नहीं छोड़े जा सकते।

आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी नैतिक और रणनीतिक आवश्यकता ‘ह्यूमन इन द लूप’ यानी निर्णय प्रक्रिया में इंसान का शामिल रहना है। एकदम से सारा युद्ध स्वचालित नहीं हो सकता। एआई और ऑटोमेशन को दिशा देने और उसे संभालने के लिए विशेष कौशल की जरूरत होगी, जिससे आने वाले समय में सेना के कमांडरों की भूमिका घटने के बजाय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
जकार्ता से जनरल एटॉमिक्स तक की उड़ान
डॉ. लाल का यह विजन इसलिए भी अहम है क्योंकि वह किसी कंपनी के केवल बही-खाते नहीं संभालते, बल्कि उनके फैसले वैश्विक कूटनीति और देशों की सुरक्षा तय करते हैं। जकार्ता में जन्मे एक भारतीय राजनयिक के इस बेटे ने बहुत कम उम्र में सरहदों के पार की दुनिया देखी। विज्ञान को रास्ता बनाया, नासा की प्रयोगशाला तक पहुंचे, खुद विमान उड़ाना सीखा और आज वह उस कुर्सी पर बैठे हैं, जहां से दुनिया का शक्ति-संतुलन तय होता है। बोइंग से लेकर लॉकहीड मार्टिन और अब जनरल एटॉमिक्स के मुखिया के तौर पर उनका मानना है कि विज्ञान किस तरह शक्ति में बदलता है, यह समझना आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है।
‘शक्ति से शांति’ और दिनकर का संदेश
भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा रिश्तों पर बात करते हुए उन्होंने साफ किया कि यह गठजोड़ केवल चीन रूपी किसी साझा चुनौती के कारण नहीं है। व्यापार, लोकतांत्रिक मूल्य और आपसी विश्वास ने पिछले कुछ दशकों में दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार को शून्य से 25 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया है। मानवाधिकार और हथियार निर्माण के विरोधाभास पर डॉ. लाल ने शक्ति के जरिए शांति के सिद्धांत पर जोर दिया। उनका स्पष्ट कहना था कि शांति की रक्षा केवल आदर्शों से नहीं, बल्कि सामर्थ्य से होती है। जब कोई देश कमजोर दिखता है, तो दूसरे देश उस पर हावी होने का प्रयास करते हैं। इस विजन को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर पंक्तियों-‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो…’ से जोड़ते हुए उन्होंने सहमति जताई कि बिना शक्ति के शांति की कल्पना अधूरी है।
2047 के लिए ‘तकनीकी त्रिकोण’ और भारत का सामर्थ्य
वर्ष 2047 तक भारत को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए डॉ. लाल ने एक तकनीकी त्रिकोण का सुझाव दिया। इसमें कृत्रिम मेधा, ऊर्जा जरूरतों के लिए परमाणु ऊर्जा और मानव रहित विमान (ड्रोन) प्रणालियां शामिल हैं। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा प्रतिभा है। डॉ. लाल का मानना है कि भारत कम लागत में बेहतरीन नवाचार करने की असाधारण क्षमता रखता है। ड्रोन और सेमीकंडक्टर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दुनिया को समाधान देने वाला देश बन सकता है। आज अमेरिकी कंपनियां भी भारतीय स्टार्टअप्स की प्रतिभा से सीख रही हैं।
प्रेरणा इसलिए, क्योंकि आसान रास्ता नहीं चुना
युवाओं को सफलता का मंत्र देते हुए डॉ. लाल ने अपनी ही जीवन यात्रा का उदाहरण दिया। जब दुनिया आईटी और कंप्यूटर साइंस की ओर भाग रही थी, तब उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के अपने जुनून को चुना। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि करियर का फैसला चलन (ट्रेंड) देखकर नहीं, बल्कि अपनी रुचि के आधार पर करें। किसी भी विषय की सतह पर तैरने के बजाय उसकी गहराई तक जाएं और मूल सिद्धांतों को समझें।
दिल अब भी है हिंदुस्तानी
दुनिया की सबसे उन्नत रक्षा प्रणालियों को दिशा देने वाले डॉ. लाल भले ही अमेरिका में रहते हों, लेकिन जब भी वह भारत आते हैं, तो उन्हें ‘घर वापसी’ का अहसास होता है। वैश्विक रक्षा उद्योग के शीर्ष तक पहुंचकर भी उनकी सबसे बड़ी आकांक्षा भारत को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम और आत्मनिर्भर बनते देखने की है। इसलिये वह पीएम मोदी से शोध में ज्यादा निवेश और अवसरों को ठीक से भुनाने का अनुरोध भी करते हैं।

