संभाग के सबसे बड़े पीबीएम अस्पताल के जनाना विंग में सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ने और किडनी फेल होने के बेहद गंभीर मामले ने अब एक दर्दनाक मोड़ ले लिया है। कई दिनों तक आईसीयू में वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद फलौदी निवासी प्रसूता प्रीति की शुक्रवार को मौत हो गई।

अस्पताल अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया ने प्रसूता की मौत की पुष्टि करते हुए बताया कि प्रारंभिक तौर पर मौत का कारण मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर माना जा रहा है, हालांकि वास्तविक कारणों का खुलासा विस्तृत चिकित्सकीय समीक्षा रिपोर्ट के बाद ही होगा। इस दुखद घटना के बाद जहां पीड़ित परिवारों में कोहराम मच गया है, वहीं अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली और मातृत्व स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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10 दिन पहले सामने आया था मामला
बता दें कि इस पूरे मामले की शुरुआत जून के पहले सप्ताह में हुई थी, जब अस्पताल के जनाना विभाग में सी-सेक्शन डिलीवरी के बाद अचानक 6 प्रसूताओं की हालत गंभीर हो गई। 20 से 27 वर्ष की इन युवा माताओं में ऑपरेशन के बाद यूरिन रुकना, प्लेटलेट्स में भारी गिरावट, अत्यधिक ब्लीडिंग और किडनी फेलियर जैसी खतरनाक जटिलताएं देखी गईं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सभी महिलाओं को तुरंत आईसीयू में शिफ्ट कर डायलिसिस पर रखा गया था।
इसी दौरान श्रीरामसर निवासी प्रसूता शारदा की हालत डिलीवरी के कुछ ही घंटों बाद इतनी बिगड़ गई कि उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। संक्रमण के खतरे के चलते डॉक्टरों ने उनके 10 दिन के नवजात को मां से अलग रखा। ऐसे मुश्किल वक्त में बच्चे की मौसी सुनीता आगे आईं। उन्होंने न केवल नवजात को संभाला, बल्कि उसे अपना दूध पिलाकर मां की कमी को पूरा किया और बच्चे की जान बचाई।
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चिकित्सा मंत्री का विवादित बयान
यह संवेदनशील मामला उस समय राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन गया, जब मंगलवार को स्थिति का जायजा लेने अस्पताल पहुंचे चिकित्सा एवं जिला प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने एक विवादित टिप्पणी कर दी। पत्रकार वार्ता के दौरान जब मीडिया ने एक साथ कई प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ने और संभावित लापरवाही को लेकर सवाल किया, तो मंत्री ने सीधे जवाब देने के बजाय मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुरेंद्र वर्मा की ओर देखते हुए कहा- “बताइए प्रिंसिपल साहब, गर्भवती महिलाएं गंभीर हालत में चलते हुए आई थीं या नाचते हुए आई थीं।”
इस असंवेदनशील बयान के बाद प्रेस वार्ता में तीखी बहस छिड़ गई। हालांकि मंत्री ने बाद में स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि ये महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों से पहले ही अत्यधिक गंभीर स्थिति में यहां रैफर होकर आई थीं और अस्पताल के डॉक्टरों ने मेहनत कर उनकी जान बचाई है।
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जांच के लिए जोधपुर से आई विशेषज्ञों की टीम
मामले की गंभीरता और बढ़ते जन-आक्रोश को देखते हुए जोधपुर से 6 विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक विशेष टीम बीकानेर भेजी गई। इस टीम में बायोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. प्रभुत प्रकाश, मेडिसिन विंग के प्रोफेसर डॉ. प्रभात कंवरिया, डॉ. कल्पना मेहता, डॉ. एसएस राठौड़, डॉ. मनोज वर्मा और डॉ. प्रवीण राठौड़ शामिल थे। टीम ने अस्पताल के गायनी विभाग, आईसीयू और ब्लड बैंक के रिकॉर्ड्स खंगाले और उपचार प्रक्रिया की गहन समीक्षा की। इसी बीच अस्पताल प्रशासन ने समय रहते संक्रमण की पहचान करने के लिए जल्द ही एक अत्याधुनिक इन्फेक्शन डिटेक्टर मशीन लगाने की तैयारी की है।
दो प्रसूताओं को छुट्टी भी मिली
इस घने अंधेरे के बीच एक राहत भरी खबर यह रही कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कड़ी निगरानी के बाद दो प्रसूताओं की सेहत में सुधार दर्ज किया गया, जिसके बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। एसपी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुरेंद्र वर्मा के अनुसार, एक्यूट किडनी इंजरी के पीछे अत्यधिक ब्लीडिंग, मल्टीपल ऑर्गन डिस्फंक्शन या गर्भावस्था से जुड़ी गंभीर जटिलता HELLP सिंड्रोम भी हो सकता है। फिलहाल किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
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एक प्रसूता की मौत और कई महिलाओं की गंभीर हालत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सिजेरियन डिलीवरी के बाद एक साथ इतनी महिलाओं की तबीयत क्यों बिगड़ी? क्या इसके पीछे संक्रमण था, कोई चिकित्सकीय जटिलता थी या फिर किसी स्तर पर लापरवाही हुई? इन सवालों का जवाब अब जांच रिपोर्ट से ही मिल सकेगा। फिलहाल पूरा प्रदेश जांच के नतीजों और अन्य मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार की उम्मीद लगाए बैठा है।

