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भारत-अमेरिका संबंध:nyt ने लिखा- रूबियो का दौरा ‘पेनकिलर’ जैसा, लेकिन रिश्ते सुधारने के लिए असली दवा की जरूरत – Indo-us Relations: Rubio’s Visit A ‘painkiller’, Real Medicine Needed To Revive Ties

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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने हाल ही में नई दिल्ली का दौरा किया, इसका मुख्य मकसद इस दक्षिण एशियाई दिग्गज देश को यह भरोसा दिलाना था कि वह अभी भी अमेरिका पर निर्भर रह सकता है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा ट्रंप प्रशासन की व्यापार, आव्रजन (इमिग्रेशन) और ईरान युद्ध से जुड़ी नीतियों के कारण लगे गहरे घावों पर महज एक मरहम या पेनकिलर की तरह है। इस बहुचर्चित दौरे से भारत को कूटनीतिक स्तर पर ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ है।

असली दवा की दरकार और ऊर्जा संकट का दबाव

सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के विशेषज्ञ डॉ. कॉन्स्टेंटिनो जेवियर के अनुसार, “यह दौरा एक अच्छे पेनकिलर की तरह था, लेकिन संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ असली दवा की जरूरत है”। यह असली दवा दोनों देशों के नेताओं के बीच एक मौलिक राजनीतिक रीसेट, ट्रंप के भारत दौरे या व्यापार और रक्षा सौदों में किसी बड़ी सफलता के रूप में हो सकती है।

भारत अपनी कच्चे तेल की 90 प्रतिशत जरूरतें आयात से पूरी करता है। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत की तेल तक पहुंच काफी कम हो गई, जिसके कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोगों से ईंधन बचाने के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने की अपील करनी पड़ी। इससे पहले अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ लगा दिया था, जिसे भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद सीमित करने पर सहमति जताने के बाद फरवरी में हटा लिया गया।

नीतियों में निरंतरता की कमी और चीन का फैक्टर

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों के विपरीत ट्रंप का भारत के प्रति रवैया अस्थिर (ब्लो-हॉट, ब्लो-कोल्ड) रहा है। किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हर्ष वी. पंत के मुताबिक, मुख्य समस्या ट्रंप प्रशासन की नीतियों में ‘निरंतरता की कमी’ और इस रिश्ते के प्रति सार्वजनिक प्रतिबद्धता का अभाव है, जिससे भारत के पास जुड़ाव का कोई ठोस ढांचा नहीं बचा है। 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ट्रंप की हालिया मुलाकात ने भी भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। डॉ. जेवियर का कहना है कि भारत को डर है कि अमेरिका-चीन संबंध स्थिर होने पर उसकी उपयोगिता कम हो सकती है और वह महज अमेरिका का एक ‘बैकअप प्लान’ बनकर रह सकता है।

दावों और हकीकत में अंतर

अपने दौरे के दौरान रूबियो ने भारत को अमेरिका के ‘सबसे रणनीतिक भागीदारों में से एक’ बताया। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी नई दिल्ली के एक रिसेप्शन में फोन पर जुड़कर पीएम मोदी को अपना बेहतरीन मित्र कहा और दावा किया कि भारत जो चाहता है, उसे मिलता है। हालांकि, हकीकत इसके उलट नजर आती है; ट्रंप प्रशासन की आव्रजन पाबंदियों ने भारतीय छात्रों और कामगारों को काफी नुकसान पहुंचाया है। रूबियो ने इन नीतियों का यह कहकर बचाव किया कि ये विशेष रूप से भारतीयों को लक्षित नहीं हैं।

दौरे के मुख्य नतीजे और आगे की राह


  • खनिज समझौता: दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने पर मिलकर काम करने से जुड़े एक समझौते की रुपरेखा पर हस्ताक्षर किए हैं।

  • व्यापार वार्ता: भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने जानकारी दी है कि व्यापार वार्ता के अगले दौर के लिए एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जल्द ही भारत का दौरा करेगा।

  • क्वाड पर अनिश्चितता: रूबियो के दौरे का अंतिम दिन क्वाड देशों (अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया) की समुद्री सुरक्षा और वाणिज्य पर केंद्रित रहा। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि चीन पर ट्रंप के फोकस को देखते हुए क्वाड में अमेरिका की सक्रियता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

  • नए विकल्प: वाशिंगटन के साथ संबंधों को लेकर अपनी चिंताओं के बीच, भारत ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) सहित अन्य देशों के साथ कई नई साझेदारियां भी की हैं।

कुल मिलाकर, रूबियो का दौरा भारत के हितों के लिहाज से कूटनीतिक आश्वासन तो देता है, लेकिन भारत-अमेरिका के मजबूत आर्थिक साझेदारी वाले ढांचे को फिर से स्थापित करने के लिए अभी नीतिगत स्तर पर कई गंभीर कदम उठाने बाकी हैं।

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