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Us-israel:नेतन्याहू ने कराया ट्रंप का नुकसान? इस्राइल को बचाने के चक्कर में खाली हुआ अमेरिका का रक्षा खजाना – How Netanyahu Harm Trump America’s Defense Coffers Depleted In The Effort To Save Israel

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ईरान और इस्राइल के बीच हाल ही में हुए युद्ध ने एक नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका ने इस्राइल की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन अब इसका बहुत बड़ा नुकसान खुद अमेरिका को उठाना पड़ रहा है। वाशिंगटन पोस्ट की एक नई और चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइल को बचाने के चक्कर में अमेरिका के अपने सबसे आधुनिक मिसाइल इंटरसेप्टर (हवा में दुश्मन की मिसाइल को नष्ट करने वाले हथियार) का लगभग आधा भंडार पूरी तरह से खत्म हो गया है। इस बड़े खुलासे के बाद से अमेरिका के रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) की चिंताएं बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं।

इस खबर का सीधा और आसान मतलब यह है कि ईरान के हमलों से इस्राइल को बचाने का सबसे बड़ा बोझ अमेरिका ने अपने कंधों पर उठाया था। जब ईरान ने इस्राइल पर मिसाइलें दागीं, तो अमेरिका ने अपने सबसे बेहतरीन और महंगे हथियार पानी की तरह बहा दिए। रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने 200 से अधिक ‘थाड’ मिसाइल इंटरसेप्टर चलाए। इसके साथ ही, पूर्वी भूमध्य सागर में खड़े अमेरिकी नौसेना के जहाजों से 100 से ज्यादा ‘स्टैंडर्ड मिसाइल-3’ और ‘स्टैडर्ड मिसाइल-6’ भी दागे गए। वहीं दूसरी तरफ, इस्राइल ने बड़ी चालाकी से अपने हथियारों को बचा कर रखा और 100 से भी कम ‘एरो’ इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया।

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क्या हथियारों की कमी से अमेरिका के दूसरे सहयोगी देशों पर खतरा मंडरा रहा है?

इस सवाल का जवाब हां है। अमेरिका के हथियार इतनी तेजी से खत्म होने के कारण उसके अन्य सहयोगी देशों, खासकर जापान और दक्षिण कोरिया में डर और बेचैनी का माहौल बन गया है। ये दोनों देश चीन और उत्तर कोरिया के किसी भी अचानक होने वाले हमले से बचने के लिए पूरी तरह से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर ही निर्भर करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के पास अब मुश्किल से 200 ‘थाड’ इंटरसेप्टर बचे हैं और हथियार बनाने वाली कंपनियां इतनी तेजी से नए हथियार नहीं बना पा रही हैं। अगर दुनिया के किसी और हिस्से में नया युद्ध छिड़ गया, तो अमेरिका अपने बाकी सहयोगी देशों को सुरक्षा कैसे दे पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।

क्या युद्ध दोबारा शुरू होने पर अमेरिका के सामने खड़ा हो सकता है बड़ा रक्षा संकट?

रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों ने यह बहुत गंभीर चेतावनी दी है कि यदि ईरान के खिलाफ फिर से कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई शुरू होती है, तो इन हथियारों की भारी कमी का संकट बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। आपको बता दें कि ट्रंप मौजूदा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। ऐसे में अगर वे हालात को देखते हुए ईरान के खिलाफ फिर से एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू करने का फैसला लेते हैं, तो अमेरिका के इंटरसेप्टर भंडार पर बहुत भारी दबाव आ जाएगा। इसके अलावा, एक और बड़ी समस्या यह है कि इस्राइल भी अपनी कुछ प्रमुख मिसाइल रक्षा प्रणालियों को मेंटेनेंस (रखरखाव) के लिए बंद करने वाला है, जिससे अमेरिका पर निर्भरता और भी अधिक बढ़ जाएगी।

पेंटागन और इस्राइल ने हथियारों के इस असंतुलन पर क्या दी है सफाई?

हथियारों के इस बड़े असंतुलन पर जब सवाल उठे, तो पेंटागन के मुख्य प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सामने आकर अमेरिका और इस्राइल दोनों का मजबूती से बचाव किया है। उन्होंने कहा कि बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर हमारे बड़े रक्षा नेटवर्क का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा हैं। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान अमेरिका और इस्राइल दोनों ने पूरी ईमानदारी से मिलकर सुरक्षा का बोझ उठाया है। वाशिंगटन में मौजूद इस्राइली दूतावास ने भी अपनी सफाई में कहा कि ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ और ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ में दोनों देशों के बीच सबसे शानदार तालमेल देखने को मिला था। दूतावास ने स्पष्ट किया कि इस्राइल जैसा सक्षम साथी आज अमेरिका के पास कोई और नहीं है।

इन सबके बीच, अमेरिका के तेवर ईरान के खिलाफ बिल्कुल भी नरम नहीं पड़े हैं। ट्रंप मौजूदा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और उन्होंने एक बार फिर कड़े शब्दों में कहा है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए पूरी तरह से खुला रहे। वहां किसी तरह का कोई टोल नहीं लगेगा। अमेरिका की सख्ती के कारण ईरान को हर दिन लगभग 50 करोड़ डॉलर का भारी नुकसान हो रहा है। अमेरिकी नौसेना ने बेहतरीन काम किया है और अब अमेरिका की स्पष्ट इजाजत के बिना कोई भी व्यापारिक जहाज ईरान से आ या जा नहीं सकता है।

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