
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को शांति स्थापित करने वाला नेता बताते हैं, लेकिन उनके फैसले और जमीन पर उठाए गए कदम इससे बिल्कुल उलट दिखते हैं. विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाएल अव्वाद ने यह दावा करते हुए कहा कि ट्रंप की नीतियों ने कई देशों में हालात और बिगाड़े हैं.
ट्रंप के दावे और हकीकत में अंतर
विदेश मामलों के विशेषज्ञ वाएल अव्वाद ने कहा कि ट्रंप खुद को शांति का समर्थक बताते हैं, लेकिन वेनेजुएला, ईरान और यूक्रेन-रूस युद्ध में उनके फैसलों ने कई लोगों की जान ली है. उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप सच में शांति चाहते, तो अमेरिका की ताकत का इस्तेमाल सभी पक्षों को बातचीत की टेबल पर लाने के लिए करते.
‘पीसमेकर’ की छवि पर सवाल
अव्वाद के मुताबिक, ट्रंप खुद को नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदार के रूप में पेश करते हैं और बार-बार शांति वार्ता की बात करते हैं, लेकिन उनकी “शांति” की परिभाषा ही विवादित है. उन्होंने कहा कि ट्रंप की सोच “अमेरिकी फर्स्ट” और मेक अमेरिकी ग्रेट अगेन विचारधारा से जुड़ी है, जो बहुध्रुवीय दुनिया में ठीक से काम नहीं करती.
तीन सैन्य विकल्प- युद्ध या समझौता
अव्वाद ने बताया कि ट्रंप के सामने तीन विकल्प हैं. पहला, ईरान के साथ युद्ध और नाकेबंदी खत्म कर समझौता करना, जिससे दोनों पक्ष तनाव कम कर सकते हैं. दूसरा विकल्प है लगातार बमबारी कर ईरान पर दबाव बनाना, ताकि वह बातचीत के लिए मजबूर हो जाए.
तीसरा विकल्प सबसे खतरनाक?
उन्होंने कहा कि ट्रंप फिलहाल तीसरे विकल्प ईरान के खिलाफ नाकेबंदी जारी रखने की ओर झुकाव दिखा रहे हैं. लेकिन इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और ईरान जवाबी सैन्य कार्रवाई कर सकता है, जिससे बड़ा टकराव हो सकता है.

भारत-ईरान बातचीत क्यों अहम
अव्वाद ने भारत और ईरान के बीच बातचीत को भी महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि एस जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच संपर्क इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत के हित इस क्षेत्र से जुड़े हैं. खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरने वाले व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के कारण भारत के लिए स्थिरता बेहद जरूरी है.
ईरान का भी कड़ा रुख
इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा कि पर्शियन गल्फ किसी भी विदेशी ताकत की मनमर्जी का मैदान नहीं है, जिससे अमेरिका पर अप्रत्यक्ष निशाना साधा गया.
