सार
भारत में साइबर हमले अब सिर्फ सिस्टम को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि एआई भी हमलावरों का हथियार बन रहा है। सिस्को की नवीनतम रिलेंटलेस डिफेंस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 12 महीनों में भारत में 96 प्रतिशत कंपनियों को ऐसे साइबर हमलों का सामना करना पड़ा, जिन्होंने उनके कामकाज को बुरी तरह ठप कर दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक-तिहाई से अधिक हमलों में एआई तकनीक का इस्तेमाल हुआ था। जानिए इस रिपोर्ट के सभी महत्वपूर्ण आंकड़ों के बारे में…

भारत में साइबर हमलों का खतरा कितना बड़ा हो चुका है, इसका अंदाजा सिस्को की एक नई रिपोर्ट के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। पिछले 12 महीनों में देश के 96 प्रतिशत संगठनों ने ऐसे साइबर हमलों का सामना किया, जिनसे उनके कामकाज में बड़ी रुकावट आई, लेकिन इस मामले में सिर्फ हमले ही चिंता की वजह नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार हर तीन में से एक से ज्यादा मामलों में एआई से लैस हमले भी शामिल थे।
दिलचस्प बात यह है कि सुरक्षा की राह में सबसे बड़ी परेशानी हमेशा तकनीक की कमी नहीं है। कई बार समस्या संगठन के अंदर ही छिपी होती है, कहीं डेटा अलग-अलग सिस्टम में बंद है, कहीं टीमें साथ काम नहीं करतीं और कहीं जरूरी फैसलों में मंजूरी मिलने में इतना समय लग जाता है कि खतरा आगे निकल जाता है।
96 प्रतिशत संगठन हुए प्रभावित, एआई ने बढ़ाई चिंता
सिस्को की रिलेंटलेस डिफेंस रिपोर्ट में 30 बाजारों के आठ हजार सुरक्षा पेशेवरों को शामिल किया गया। इनमें भारत के करीब एक हजार लोग थे। पिछले एक साल के अनुभवों के आधार पर सामने आया कि भारत में 96 प्रतिशत संगठनों को ऐसे साइबर हमलों का सामना करना पड़ा, जिनका असर उनके रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ा। इनमें हर तीन में से एक से ज्यादा मामलों में एआई से लैस हमले शामिल थे। यानी साइबर खतरा अब सिर्फ ज्यादा हमलों का नहीं है, बल्कि हमलावरों के पास एआई जैसी तकनीक आने से हमलों का तरीका भी बदल रहा है।
लेकिन सबसे बड़ी कमजोरी है अंदर की दूरी
- रिपोर्ट का एक और अहम हिस्सा सामने आया है। संगठन की सुरक्षा सिर्फ मजबूत सिक्योरिटी टूल्स खरीदने से बेहतर नहीं होती। अगर सिक्योरिटी, नेटवर्किंग और आईटी की टीमें अलग-अलग काम करती रहें, डेटा अलग-अलग जगहों पर बंटा रहे और किसी खतरे पर फैसला लेने में देरी हो, तो अच्छी तकनीक होने के बावजूद प्रतिक्रिया धीमी हो सकती है।
- भारत में केवल 40 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी सिक्योरिटी, नेटवर्किंग और आईटी टीमें साथ मिलकर काम करती हैं और साझा टूल्स व विजिबिलिटी का इस्तेमाल करती हैं। यानी हर 10 में से करीब 6 संगठनों में ये टीमें पूरी तरह एक साथ काम नहीं कर रही हैं।
डेटा है, लेकिन जरूरत के वक्त मिल नहीं रहा
- इसके अलावा साइबर सुरक्षा में डेटा बेहद अहम है। किसी हमले को समझने के लिए अलग-अलग सिस्टम से मिलने वाली जानकारी को एक साथ देखना जरूरी होता है, लेकिन भारत में 44 प्रतिशत संगठनों ने बताया कि वे वास्तविक खतरों से निपटने के बजाय अलग-अलग सिस्टम से डेटा इकट्ठा करने और उन्हें जोड़ने में ज्यादा समय लगा रहे हैं।
- वहीं, 43 प्रतिशत ने कहा कि डेटा साइलो तक पहुंच न होने की वजह से जरूरी जानकारी छूट गई। यानी समस्या यह नहीं कि डेटा मौजूद नहीं है। समस्या यह है कि जरूरत पड़ने पर सही डेटा सही टीम तक पहुंच नहीं पाता।
अधिकारियों को समझाना भी आसान नहीं
- साइबर सिक्योरिटी टीमों के सामने एक और अलग तरह की चुनौती भी सामने आई हैं, अपनी बात कंपनी के बड़े अधिकारियों तक पहुंचाना। करीब 49 प्रतिशत भारतीय सुरक्षा पेशेवरों ने कहा कि उनके ओर मापे जाने वाले मेट्रिक्स इतने तकनीकी होते हैं कि उन्हें कंपनी के अधिकारियों को समझाना मुश्किल होता है।
- इसके अलावा 34 प्रतिशत लोगों को बिजनेस मेट्रिक्स को ऐसे फैसलों में बदलने में परेशानी हुई, जिन पर अमल किया जा सके। वहीं, 26 प्रतिशत ने बताया कि उनके पास सुरक्षा प्रदर्शन को मापने के लिए कोई एक जैसा फ्रेमवर्क ही नहीं है।
एआई सिर्फ खतरा नहीं, सुरक्षा का हथियार भी
यहां कहानी का दूसरा पहलू भी है। जिस एआई को साइबर हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वही सुरक्षा टीमों के लिए भी काफी उपयोगी साबित हो रहा है।
भारत में 10 में से 9 से ज्यादा सुरक्षा पेशेवरों ने माना कि एआई की मदद से खतरे का पता लगाने और उन पर प्रतिक्रिया देने की क्षमता में कम से कम 25 प्रतिशत सुधार हुआ है। करीब तीन में से एक ने यह भी कहा कि एआई ने उनके ऑपरेशनल बोझ को काफी कम किया है। इसका मतलब है कि एआई साइबर सुरक्षा के लिए सिर्फ नई चुनौती नहीं है। सही तरीके से इस्तेमाल होने पर यह सुरक्षा टीमों को तेजी से खतरे पहचानने और प्रतिक्रिया देने में मदद भी कर सकता है।
एआई एजेंट्स को लेकर क्यों रुक रहे संगठन?
एआई एजेंट्स को सिक्योरिटी ऑपरेशन्स में शामिल करने का चलन भी बढ़ रहा है। भारत में 10 में से 4 संगठन सिक्योरिटी ऑपरेशन्स में एआई एजेंट्स को बड़े स्तर पर लागू कर चुके हैं। फिर भी हर संगठन इसे तेजी से अपनाने के लिए तैयार नहीं है।
इसके पीछे डेटा लीक, सिस्टम के साथ छेड़छाड़ और थर्ड-पार्टी मैनेजमेंट से जुड़ी चिंताएं हैं। यानी संगठन एआई से मिलने वाले फायदे देख रहे हैं, लेकिन उन्हें यह भी चिंता है कि ज्यादा ऑटोमेशन कहीं नया सुरक्षा जोखिम न पैदा कर दे।
भारत का सुरक्षा स्कोर कितना रहा?
- सिस्को ने संगठनों का मूल्यांकन इस आधार पर किया कि वे अपने सिस्टम को कितनी अच्छी तरह सुरक्षित रखते हैं, खतरों का पता लगाकर कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं और कौन-सी ऑपरेशनल समस्याएं उनकी गति को प्रभावित करती हैं।
- इस आकलन में भारत का औसत स्कोर 100 में 66 रहा, जबकि वैश्विक औसत स्कोर 64 था। हालांकि, भारत में सिर्फ आठ प्रतिशत संगठन सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली श्रेणी में पहुंचे। वैश्विक स्तर पर भी यह आंकड़ा आठ प्रतिशत रहा।
- रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर प्रदर्शन करने वाले संगठनों में सुरक्षा कवरेज ज्यादा व्यापक था, खतरे पर प्रतिक्रिया तेज थी और टीमें एकजुट होकर काम करती थीं।
ज्यादा निवेश से क्या फर्क पड़ा?
साइबर सुरक्षा पर खर्च बढ़ाने वाले संगठनों में भी एक दिलचस्प अंतर देखने को मिला। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले संगठनों में सुरक्षा घटनाओं में कमी आने की संभावना लगभग दोगुनी थी। इससे संकेत मिलता है कि सुरक्षा में निवेश सिर्फ नए टूल खरीदने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मजबूत सुरक्षा के लिए तकनीक के साथ-साथ बेहतर डेटा विजिबिलिटी, तेज फैसले और अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल भी जरूरी है।
सिस्को के अधिकारी ने एआई को लेकर क्या कहा?
- सिस्को में सिक्योरिटी, ऑब्जर्वेबिलिटी और डेटा प्लेटफॉर्म के एसवीपी और जनरल मैनेजर सुनील पोटी ने कहा कि एआई को हर व्यक्ति और संगठन के लिए सुलभ बनाने के लिए उसकी नींव में भरोसा पैदा करना जरूरी है।
- उन्होंने सुरक्षा और मजबूती यानी resilience को एक-दूसरे से अलग नहीं देखने की बात कही। उनके मुताबिक जिसे देखा नहीं जा सकता, उसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता और जिसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता, उस पर भरोसा करना मुश्किल है।
- उनके अनुसार एआई पर भरोसा कायम करने के लिए सिक्योरिटी और रेजिलिएंस को एक साथ देखना जरूरी है, तभी संगठन और उपभोक्ता इस तकनीक की संभावनाओं का पूरी तरह इस्तेमाल कर पाएंगे।
असली चुनौती सिर्फ एआई नहीं है
- सिस्को की रिपोर्ट में एक बात और स्पष्ट होती है कि साइबर सुरक्षा की लड़ाई अब सिर्फ हैकर और सिक्योरिटी सिस्टम के बीच नहीं रह गई है। एक तरफ एआई हमलावरों को नई क्षमताएं दे रहा है, तो दूसरी तरफ वही तकनीक सुरक्षा टीमों को तेज बना रही है। लेकिन इन दोनों के बीच संगठन की अपनी तैयारी सबसे अहम कड़ी बन गई है।
- डेटा अलग-अलग जगह बंद हो, टीमें अलग-अलग काम करें और फैसले लेने में देरी हो, तो महंगी सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगी।
