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समय से पहले आ सकता है मानसून:25 से 27 तारीख तक केरल पहुंचने के आसार, पांच राज्यों में तेज आंधी-बारिश का अलर्ट – Monsoon Arrival Kerala May 25 Weather Alert Up Rajasthan Heatwave

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देश में मानसून तय समय से चार से छह दिन पहले दस्तक दे सकता है। आमतौर पर केरलम में मानसून एक जून तक पहुंचता है, लेकिन इस बार 25 से 27 मई के बीच केरलम पहुंचने की संभावना है। बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में एक सिस्टम बन गया है, जो अगले 48 घंटे में और मजबूत हो सकता है। इससे दक्षिण के कई राज्यों में बारिश बढ़ेगी।

मौसम विभाग के अनुसार, श्रीलंका तट के पास बना कम दबाव का क्षेत्र अब उत्तर दिशा में बढ़ते हुए दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में पहुंच गया है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रणाली आगे चलकर बंगाल की खाड़ी के मध्य भागों की ओर बढ़ सकती है। इसके साथ ही भूमध्य रेखा के पार से आने वाली नमी वाली हवाएं मजबूत होंगी। दक्षिण-पश्चिमी हवाएं अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बड़े हिस्से को प्रभावित करेंगी। मौसम के ये संकेत बता रहे हैं कि 16 मई के आसपास दक्षिण-पूर्व बंगाल की खाड़ी, दक्षिण अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मानसून की शुरुआत हो सकती है।

आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून 20 मई के आसपास दक्षिण अंडमान सागर में प्रवेश करता है। इसके बाद 22 मई तक पोर्ट ब्लेयर और उत्तर अंडमान सागर तक पहुंच जाता है। आमतौर पर इसके बाद मानसून को केरलम पहुंचने में करीब 10 से 12 दिन लगते हैं और इसके आगमन की सामान्य तिथि 1 जून मानी जाती है। लेकिन इस बार तय समय से चार दिन पहले अंडमान सागर पहुंचने की संभावना है, इस आधार पर यह 25-27 मई के बीच केरलम के तट पर पहुंच सकता है। पिछले साल मानसून दक्षिण अंडमान सागर में 13 मई को पहुंच गया था और 24 मई तक केरलम पहुंच गया था। यानी दोनों जगह सामान्य समय से करीब एक सप्ताह पहले मानसून का आगमन हुआ था।

उत्तर प्रदेश में धूल भरी आंधी, दिन में अंधेरा

उत्तर प्रदेश में मंगलवार सुबह पश्चिम यूपी के करीब 10 जिलों में गरज-चमक के साथ झमाझम बारिश हुई। धूलभरी आंधी चली और दिन में अंधेरा छा गया। कई पोल गिर गए और पेड़ उखड़ गए। कई जगहों पर चलती गाड़ियों पर पेड़ की टहनियां टूटकर गिर गईं। इससे ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में आंधी-तूफान और बारिश से 5 घरों और 7 गोशालाओं की छतें उड़ गईं। मौसम विभाग ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और यूपी समेत 5 राज्यों में आंधी-बारिश का अलर्ट जारी किया है। बिहार और उत्तराखंड के सभी जिलों में बारिश हो सकती है। वहीं, उत्तर प्रदेश के 38 जिलों में बारिश की संभावना है।

बदल रहा मानसूनी बारिश का समय, खेती से शहरों तक बढ़ी चिंता

भारत में मानसून का स्वभाव तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। कभी बारिश तय समय से देर से पहुंच रही है, तो कहीं कुछ ही घंटों में इतनी अधिक वर्षा हो रही है कि बाढ़ जैसे हालात बन जा रहे हैं। वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में बदलाव और वैश्विक मौसमी घटनाओं के कारण मानसून का पारंपरिक चक्र अस्थिर होता जा रहा है। इसका असर खेती, जल प्रबंधन, बिजली उत्पादन और शहरों की व्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। भारतीय मौसम विभाग  ने अपने ताजा पूर्वानुमान में कहा है कि सप्ताह के अंत तक दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून पहुंच सकता है। हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि लंबे समय में मानसून का समय और उसकी तीव्रता दोनों अधिक अनिश्चित होते जा रहे हैं।

कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ के बन रहे हालात

इवॉल्विंग अर्थ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार भारत में मानसून का समय स्थिर नहीं रहा। कई क्षेत्रों में बारिश देर से शुरू हो रही है, कहीं समय से पहले पहुंच रही है और कई बार शुरुआती बारिश के बाद लंबा सूखा देखने को मिल रहा है। इसके बाद अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। पहले मानसून जून की शुरुआत में केरलम पहुंचता है और फिर धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है। अब यह क्रम टूट रहा है। कुछ राज्यों में लंबे समय तक बादल नहीं बनते, जबकि कुछ में कम समय में सामान्य से कई गुना अधिक बारिश दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल कुल बारिश की मात्रा की नहीं है, बल्कि उसके समय और वितरण की है। मानसून का यही असंतुलन खेती और जल प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन बना प्रमुख कारण

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का बढ़ता तापमान मानसून प्रणाली को सीधे प्रभावित कर रहा है। समुद्र और जमीन के तापमान में बढ़ता अंतर हवाओं की दिशा और नमी के प्रवाह को बदल रहा है। इसका असर मानसूनी बादलों की गति और वर्षा के स्वरूप पर पड़ रहा है।अल नीनो और ला नीना जैसी जलवायु घटनाएं भी मानसून को प्रभावित कर रही हैं। पहले इनके प्रभाव का अनुमान अपेक्षाकृत आसान माना जाता था, लेकिन अब इनके व्यवहार में भी अधिक अस्थिरता देखी जा रही है। कई बार ये प्रणालियां बारिश को कमजोर कर देती हैं, जबकि कुछ स्थितियों में अत्यधिक वर्षा को बढ़ावा देती हैं।

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खेती पर बढ़ रहा दबाव

भारत की बड़ी आबादी और कृषि व्यवस्था अब भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है। खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और दालों की बुवाई समय पर बारिश आने पर टिकी रहती है। बारिश में देरी होने पर बुवाई का पूरा चक्र प्रभावित होता है और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है।कई बार किसान शुरुआती बारिश के भरोसे बुवाई कर देते हैं, लेकिन बाद में लंबे सूखे के कारण बीज और पौधे खराब हो जाते हैं। दूसरी ओर अचानक भारी वर्षा खेतों में जलभराव पैदा कर देती है, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं। इसका सीधा असर किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।

शहरों में बढ़े जलभराव और पानी संकट के खतरे

मानसून की अनिश्चितता का असर अब बड़े शहरों में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। कम समय में अत्यधिक बारिश होने से सड़कों पर पानी भरने, यातायात बाधित होने और शहरी बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। कई शहरों की जल निकासी व्यवस्था इतनी तेज बारिश संभालने में सक्षम नहीं है। दूसरी ओर लंबे सूखे अंतराल के कारण जलाशयों और बांधों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता। इससे पीने के पानी और जलविद्युत उत्पादन पर असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में जल संकट और शहरी बाढ़ दोनों साथ-साथ बढ़ सकते हैं।

बादलों और हवाओं के पैटर्न में बदलाव के संकेत

भारतीय वैज्ञानिकों के एक अन्य अध्ययन में महाराष्ट्र के कोल्हापुर क्षेत्र में मानसून से पहले बादलों और हवाओं के व्यवहार में बदलाव दर्ज किया गया है।विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान के वैज्ञानिकों ने 2016 से 2020 के बीच मार्च से मई तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया।शोधकर्ताओं ने ऑल स्काई इमेजर नामक उपकरण की मदद से बादलों की गति, दिशा और फैलाव का अध्ययन किया। यह उपकरण सामान्यतः ऊपरी वायुमंडल और रात के वातावरण के अध्ययन में उपयोग होता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसका इस्तेमाल बादलों की गतिविधि समझने के लिए किया।अध्ययन में पाया गया कि कोल्हापुर क्षेत्र में बादलों की गति और उनके फैलाव की दिशा में बदलाव हो रहा है। कई मामलों में बादलों की दिशा दक्षिण-पश्चिम की ओर अधिक झुकती दिखाई दी।वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवर्तन भविष्य में मानसूनी वर्षा के पैटर्न में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है।शोधकर्ताओं के अनुसार बादलों का व्यवहार पृथ्वी की जलवायु को सीधे प्रभावित करता है। बादल सूर्य से आने वाली ऊर्जा और पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा दोनों को नियंत्रित करते हैं। ऐसे में बादलों की गति और संरचना में बदलाव का असर मानसून और वर्षा पर भी पड़ सकता है।

नई रणनीतियों की बढ़ती जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मानसून के दौर में भारत को खेती, जल संरक्षण और शहरी योजना की रणनीतियों में बड़े बदलाव करने होंगे। मौसम आधारित पारंपरिक अनुमान अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं।वैज्ञानिक, बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, जल संरक्षण, सूखा और बाढ़ दोनों से निपटने वाली कृषि तकनीकों तथा शहरों में मजबूत जल निकासी व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं। उनका मानना है कि यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो मानसून की बढ़ती अनिश्चितता आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था और संसाधनों पर गंभीर दबाव डाल सकती है।

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