एसआईआर को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित 14 आपत्तियों पर चुनाव आयोग के बयान के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बुधवार को कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डाटाबेस के केंद्रीकरण, गोवा के 97 मतदाताओं, बहाल किए गए नामों के खिलाफ अपील और कैबिनेट सचिव से कथित संवाद समेत सभी मुद्दों पर बिंदुवार और दस्तावेजी स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने आगे कहा कि आयोग का जवाब उन कई खास सवालों का जवाब देता हुआ नहीं दिखता, जो इस पूरे मामले में उठे हैं। उन्होंने कहा कि चुनावी संस्थाओं का महत्व देखते हुए इन सवालों को सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखना और उनका पारदर्शी तरीके से जवाब दिया जाना जरूरी है। वहीं ईसी ने कहा है कि अलग-अलग राय और सुझाव किसी भी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और उसके सभी अंतिम आदेश कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी किए गए हैं।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से गरमाया मामला
थरूर की यह प्रतिक्रिया ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की उस रिपोर्ट के बाद आई, जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों अधिकारियों ने कहा था कि कुछ फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देशभर में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी चुनाव आयोग की निगरानी में चल रही थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा चुनावी मतदाता सूची के डाटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
‘अलग राय होना सामान्य प्रक्रिया’
दो चुनाव आयुक्तों की ओर से एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के बाद चुनाव आयोग पर भी जवाब देने का दबाव बढ़ा। आयोग ने बुधवार को कहा कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां आना सामान्य बात है। आयोग ने अपने बयान में कहा कि उसके सभी आदेश पूरी कानूनी मान्यता रखते हैं और तय वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत जारी किए जाते हैं। आयोग के मुताबिक, अंतिम फैसला लिए जाने से पहले अलग-अलग विचार और सुझाव निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
‘सिर्फ सर्वसम्मति बताने से सवाल खत्म नहीं होते’
ईसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि आयोग ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच रिपोर्ट के जवाब में मुख्य रूप से यह कहा है कि आंतरिक टिप्पणियां विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं, उसके फैसले कानून के मुताबिक होते हैं, डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है और पिछले एक साल में आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। हालांकि, प्रेस नोट में जांच के दौरान उठाए गए कई खास सवालों का जवाब मिलता हुआ नहीं दिखता। यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी अंतिम फैसले पर सभी की सहमति होने की बात और फैसले से पहले दर्ज की गई आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।
14 आपत्तियां दर्ज हुई थीं तो उनका हुआ क्या?
थरूर ने सबसे पहले सवाल उठाया कि क्या रिपोर्ट में जिन 14 आपत्तियों का जिक्र किया गया है, वे वास्तव में आधिकारिक तौर पर दर्ज की गई थीं? अगर दर्ज की गई थीं तो प्रत्येक आपत्ति पर आयोग ने क्या फैसला लिया? उनका कहना है कि इस बारे में दस्तावेजी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर आपत्ति जताई और बाद में उन आपत्तियों का क्या निपटारा हुआ।
फॉर्म-6 में बदलाव का कानूनी आधार क्या था?
थरूर ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि इस फॉर्म में बदलाव करने का सटीक कानूनी आधार क्या था, खासकर तब जब इस प्रक्रिया पर खुद चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज की गई थीं। उनका सवाल यह भी है कि अगर बदलावों को लेकर अंदर ही अंदर आपत्तियां उठी थीं, तो उन आपत्तियों पर आयोग ने क्या विचार किया और अंतिम निर्णय तक कैसे पहुंचा गया।
मतदाता सूची के डाटाबेस पर केंद्रीकरण का मुद्दा
थरूर ने चुनावी मतदाता सूची के डाटाबेस और आईटी सिस्टम के नियंत्रण को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने पूछा कि मतदाता सूची के डाटाबेस तक पहुंच और आईटी नियंत्रण को केंद्रीकृत करने को लेकर जो चिंताएं सामने आई थीं, उनका आखिर क्या हुआ? केवल यह कहना कि डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा नियंत्रण मौजूद हैं, उन खास सवालों का पूरा जवाब नहीं है जो डाटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर उठाए गए थे। थरूर ने गोवा से जुड़े उस मामले पर भी चुनाव आयोग से जवाब मांगा, जिसमें कथित तौर पर 97 मतदाताओं का मामला सामने आया था। उन्होंने पूछा कि गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े रिपोर्ट किए गए मामले की वास्तविक स्थिति क्या थी और आयोग इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह देखता है।
जिन मतदाताओं के नाम बहाल हुए, उनके खिलाफ अपील किसने की?
थरूर ने एक और अहम सवाल यह उठाया कि जिन मतदाताओं का नाम पहले हटाया गया और बाद में उनकी सूची में शामिल होने की स्थिति बहाल कर दी गई, उनके खिलाफ अपील करने का फैसला किसने लिया? उन्होंने इस बात पर भी स्पष्टीकरण मांगा कि इन अपीलों को शुरू करने के पीछे किस स्तर पर निर्णय लिया गया और इसके लिए किस अधिकारी या संस्था ने मंजूरी दी थी।
कैबिनेट सचिव को भेजे गए संदेशों पर भी जवाब मांगा
थरूर ने कैबिनेट सचिव से कथित तौर पर हुई बातचीत और संचार को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि कैबिनेट सचिव को कथित तौर पर भेजे गए संदेशों या पत्राचार की परिस्थितियां क्या थीं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या आयोग की ओर से ऐसे कोई संचार जारी किए गए थे, जिनके लिए जरूरी मंजूरी नहीं ली गई थी, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।
‘हर अधिकारी सुझाव देने के लिए अधिकृत’
चुनाव आयोग ने अपने बयान में यह भी कहा कि आयोग के केवल तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव दे सकता है। आयोग के मुताबिक, ड्राफ्ट स्तर पर आयोग के सदस्यों की ओर से उठाए जाने वाले संचालन संबंधी सवाल या दिए गए सुझाव सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा करना और चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाना है।
आयोग ने कानूनी प्रक्रिया का दिया हवाला
ईसी ने कहा कि आयोग की ओर से जारी किए जाने वाले सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी कानूनी मान्यता रखते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों से जुड़े 2023 के कानून के तहत तय वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हैं। आयोग ने दोहराया कि किसी संस्था में अंतिम निर्णय से पहले अलग-अलग राय और टिप्पणियां आना स्वाभाविक है। उसके मुताबिक, ये टिप्पणियां अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले होने वाली विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।
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थरूर की मांग- सामान्य बयान नहीं, बिंदुवार जवाब मिले
थरूर ने कहा कि चुनाव आयोग का सामान्य प्रेस नोट उन सभी सवालों को खत्म नहीं करता जो रिपोर्ट के बाद उठे हैं। उन्होंने आयोग से इन मुद्दों पर बिंदुवार और दस्तावेजों के आधार पर स्पष्टीकरण देने की मांग की। उनके मुताबिक, आयोग के फैसले अंतिम रूप से सर्वसम्मति से लिए गए थे, यह बताना अपने आप में इस सवाल का जवाब नहीं है कि फैसले की प्रक्रिया के दौरान दर्ज की गई आपत्तियों के साथ क्या हुआ। थरूर ने कहा कि इसलिए चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त कार्यालय की ओर से इन सभी मुद्दों पर स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब देना उपयोगी होगा, बजाय इसके कि सामान्य प्रेस नोट को पूरी जांच रिपोर्ट का जवाब माना जाए।


