अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति अब उनके लिए ही बड़ी कानूनी और आर्थिक चुनौती बनती दिखाई दे रही है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहले ही ट्रंप प्रशासन द्वारा कई देशों पर लगाए गए अतिरिक्त आयात शुल्क को गैरकानूनी करार दे चुका है। अब सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि जिन कंपनियों ने भारी टैरिफ भरा था, उन्हें पैसा कैसे और कब लौटाया जाएगा। न्यूयॉर्क की अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत में हुई सुनवाई के दौरान जज रिचर्ड ईटन ने अमेरिकी सरकार और कस्टम विभाग से पूरी रिफंड प्रक्रिया पर जवाब मांगा।
आखिर ट्रंप की टैरिफ नीति पर विवाद क्यों बढ़ा?
- डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान चीन समेत कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगाए थे।
- ट्रंप प्रशासन का कहना था कि इससे अमेरिकी उद्योगों और नौकरियों को फायदा होगा।
- हालांकि बड़ी संख्या में अमेरिकी कंपनियों ने दावा किया कि इससे उनके कारोबार की लागत बढ़ गई।
- मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने कहा कि ट्रंप ने इससे कर लगाने के अधिकार में दखल दिया।
- इसके बाद अदालत ने टैरिफ को अवैध मानते हुए रिफंड प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता साफ किया।
अमेरिकी अदालत ने सरकार से क्या पूछा?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत के जज रिचर्ड ईटन ने सुनवाई के दौरान अमेरिकी कस्टम और बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी से पूछा कि रिफंड प्रक्रिया को कितनी तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। जज ने एजेंसी की ऑनलाइन प्रणाली की तारीफ की, लेकिन यह भी कहा कि न्याय विभाग की अपील पूरी प्रक्रिया को धीमा कर सकती है। जज ईटन ने कहा कि सरकार की कानूनी रणनीति खुद उसके हितों के खिलाफ जा सकती है। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या सभी कंपनियों को रिफंड मिलेगा या सिर्फ उन्हीं को जिन्होंने अदालत में मुकदमा किया था।
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कितने अरब डॉलर का रिफंड फंसा हुआ है?
अमेरिकी कस्टम विभाग के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने लगभग 166 अरब डॉलर अतिरिक्त टैरिफ के रूप में वसूले थे। अब तक करीब 90 अरब डॉलर के रिफंड दावे स्वीकार किए जा चुके हैं और 23 अरब डॉलर लौटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। फिलहाल उन कंपनियों के आवेदन लिए जा रहे हैं जिनके टैक्स बिल हाल में तय हुए थे। पुराने मामलों पर अभी फैसला बाकी है। अधिकारियों ने कहा कि जुलाई के अंत तक पुराने मामलों को संभालने के लिए नई तकनीकी व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
रिफंड को लेकर सरकार और कंपनियों में टकराव क्यों है?
अमेरिकी न्याय विभाग का कहना है कि रिफंड का अधिकार सिर्फ उन्हीं कंपनियों को मिलना चाहिए जिन्होंने ट्रंप की टैरिफ नीति को अदालत में चुनौती दी थी। वहीं कंपनियों के वकीलों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को अवैध माना है, तो सभी आयातकों को पैसा लौटाया जाना चाहिए। कंपनियों का तर्क है कि किसी एक समूह को राहत और दूसरे को नुकसान देना संविधान के खिलाफ होगा। इस मुद्दे पर अब अमेरिकी अपीलीय अदालत में भी सुनवाई चल रही है।
क्या ट्रंप की आर्थिक नीति पर उठेंगे नए सवाल?
ट्रंप की टैरिफ नीति पहले भी वैश्विक व्यापार युद्ध, महंगाई और सप्लाई चेन संकट को लेकर विवादों में रही है। अब अदालत में चल रही यह लड़ाई उनकी आर्थिक नीतियों पर नए सवाल खड़े कर रही है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर सरकार को सभी कंपनियों को रिफंड देना पड़ा, तो अमेरिकी खजाने पर बड़ा बोझ पड़ेगा। इससे ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति और फैसलों पर भी बहस तेज हो सकती है।
फिलहाल अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन जज रिचर्ड ईटन ने साफ कहा कि सरकार को रिफंड प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए। अगर अदालत ने सभी आयातकों के पक्ष में फैसला दिया, तो सरकार को अरबों डॉलर लौटाने पड़ सकते हैं। वहीं अगर फैसला सीमित कंपनियों तक रहता है, तो हजारों कंपनियां राहत से वंचित रह जाएंगी। आने वाले दिनों में यह मामला अमेरिका की व्यापार नीति और अदालतों दोनों के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है।


