देश की दुर्लभ और विशिष्ट ऊंट नस्लों में शामिल मालवी (सफेद) ऊंट आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। कभी राजस्थान और मध्यप्रदेश के कई इलाकों में बड़ी संख्या में दिखाई देने वाली यह नस्ल अब तेजी से घटती आबादी के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी संरक्षण उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में यह दुर्लभ नस्ल केवल दस्तावेजों और पुस्तकों तक सीमित होकर रह सकती है।
मालवी ऊंट की चिंताजनक स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी), बीकानेर ने इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। संस्थान के सर्वे और उपलब्ध आंकड़ों से पता चला है कि इस नस्ल की आबादी बेहद सीमित रह गई है। पशुधन गणना के आंकड़े भी इसकी लगातार घटती संख्या की पुष्टि करते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिकों ने संरक्षण के प्रयास तेज कर दिए हैं।
इसी दिशा में एनआरसीसी ने मालवी नस्ल के 12 ऊंटों का विशेष प्रजनन समूह तैयार किया है। इसमें तीन नर और नौ मादा ऊंट शामिल हैं। वैज्ञानिकों की निगरानी में शुद्ध नस्लीय प्रजनन कार्यक्रम चलाकर इनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। संस्थान का मानना है कि नियंत्रित और वैज्ञानिक प्रजनन के माध्यम से इस दुर्लभ नस्ल को नया जीवन दिया जा सकता है।
कहां पाए जाते हैं सफेद ऊंट?
मालवी ऊंट मुख्य रूप से राजस्थान के कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिलों के साथ-साथ मध्यप्रदेश के मंदसौर, नीमच, रतलाम और ग्वालियर क्षेत्र में पाया जाता है। सफेद रंग और अपेक्षाकृत छोटे कद के कारण इसकी अलग पहचान है। यह नस्ल बेहतर दूध उत्पादन के लिए भी जानी जाती है और इसकी मादा ऊंट अच्छी दुग्ध क्षमता रखती हैं।
विशेषज्ञों का क्या मानना है?
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी ऊंट नस्ल में मादा पशुओं की संख्या अत्यधिक कम हो जाने पर उसके अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में आनुवंशिक विविधता बनाए रखने और नस्ल को सुरक्षित रखने के लिए विशेष संरक्षण कार्यक्रम चलाना आवश्यक हो जाता है। यही वजह है कि मालवी ऊंट को अब संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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भारत में वर्तमान में नौ मान्यता प्राप्त ऊंट नस्लें हैं, जिनमें बीकानेरी, जैसलमेरी, कच्छी, मेवाड़ी, जालौरी, मेवाती, मालवी, मारवाड़ी और खराई शामिल हैं। इनमें मालवी नस्ल की तेजी से घटती संख्या ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।
एनआरसीसी के निदेशक क्या बोले?
एनआरसीसी के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने बताया कि संस्थान का उद्देश्य केवल इस नस्ल की संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि इसकी आनुवंशिक शुद्धता और विशिष्ट विशेषताओं का संरक्षण भी करना है। उन्होंने कहा कि मालवी ऊंट देश की महत्वपूर्ण पशु आनुवंशिक धरोहर है और इसे बचाने के लिए संस्थान दीर्घकालिक योजना पर काम कर रहा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन प्रयासों से आने वाले वर्षों में मालवी ऊंट की संख्या बढ़ेगी और यह दुर्लभ नस्ल विलुप्ति के खतरे से बाहर निकल सकेगी।

