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भारत की पहली प्लेबैक सिंगर की कहानी, गायकी के सख्त खिलाफ थे पिता, रखी थी ये अजीब शर्त

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हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में जब प्लेबैक सिंगिंग अपनी पहचान बना रही थी. उस समय एक ऐसी आवाज उभरी जिसने संगीत की दुनिया को नई दिशा दी. ये कहानी है भारत की पहली प्लेबैक सिंगर मानी जाने वाली शमशाद बेगम की.

शमशाद बेगम की गायकी के खिलाफ थे पिता
23 अप्रैल को शमशाद बेगम की डेथ एनिवर्सरी है. वो एक ऐसी गायिका थीं, जिसने अपनी अनोखी आवाज से लाखों दिलों पर राज किया. उनकी चंचल और सरल गायकी हर महफिल की जान बन जाती थी. शमशाद बेगम के पिता उनकी गायकी के सख्त खिलाफ थे, लेकिन कुछ शर्तों के साथ उन्हें घर से बाहर निकलकर गाने की इजाजत मिली.

पति ने शमशाद बेगम के सामने रखी ये शर्त
14 अप्रैल, 1919 को पंजाब के अमृतसर में जन्मीं शमशाद बेगम एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती थीं. उनके पिता नहीं चाहते थे कि वो कभी पब्लिक में गाना गाए, लेकिन परिवार और रिश्तेदारों के समझाने पर उनके पिता एक शर्त रखी कि शमशाद बेगम कभी अपनी तस्वीर नहीं खिंचवाएंगी. शमशाद ने इस शर्त को स्वीकार किया और इसी के साथ उनके करियर की शुरुआत हुई. 

भारत की पहली प्लेबैक सिंगर की कहानी, गायकी के सख्त खिलाफ थे पिता, रखी थी ये अजीब शर्त

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बचपन से था सिंगिंर से लगाव 
हैरानी वाली बात ये है कि शमशाद बेगम ने खुद भी अपनी शक्ल को लेकर झिझक महसूस की और जीवनभर तस्वीरों से दूरी बनाए रखी. स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रतिभा सामने आ गई थी. उन्हें स्कूल का हेड सिंगर बनाया गया. धीरे-धीरे वो शादी-ब्याह और पारिवारिक आयोजनों में गाने लगीं. उनकी इसी लगन ने उन्हें आगे बढ़ाया और उन्होंने पेशावर रेडियो पर गाने का मौका हासिल किया. संगीतकार गुलाम हैदर ने बहुत कम उम्र में उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पहला बड़ा मौका दिया.

‘खजांची’ से रखा बॉलीवुड में कदम
इसके बाद शमशाद बेगम ने 1941 में फिल्म ‘खजांची’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. उनकी आवाज ने जल्द ही लोगों का दिल जीत लिया और वो उस दौर की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में शामिल हो गईं. उन्होंने संगीतकार सी. रामचंद्र के साथ फिल्म ‘शहनाई’ में हिंदी सिनेमा का शुरुआती वेस्टर्न स्टाइल गीत गाया, जिसने उन्हें स्टार बना दिया. 1952 में आई फिल्म ‘बहार’ का गीत ‘सैयां दिल में आना रे’ आज भी उतना ही लोकप्रिय है. उन्होंने उस दौर के कई सफल संगीतकारों के साथ काम किया, जिनमें ओ.पी. नैयर और नौशाद शामिल हैं.

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शमशाद बेगम ने बनाई अपनी अलग पहचान
ओ.पी. नैयर ने शमशाद की आवाज की तुलना मंदिर की घंटियों से की थी. उनके गाए गीत जैसे ‘कभी आर कभी पार’, ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ और ‘लेके पहला पहला प्यार’ आज भी सदाबहार माने जाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि लता मंगेशकर, आशा भोसले और गीता दत्त जैसी गायिकाओं के दौर में भी शमशाद बेगम ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी. उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया.



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