नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद लोगों के बीच भय और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है. पानी अपने साथ कई जानें बहा ले गया और अभी हालात सामान्य होता नजर नहीं आ रहा है. मौत के आंकड़ों में हर घंटे इजाफा हो रहा है और लापता लोगों की संख्या 1000 के पार पहुंच गई है. इसके बावजूद यह कहा जा रहा है नेपाल सरकार ने चीन और अमेरिका समेत कई देशों से मदद लेने से साफ इनकार कर दिया. बताया गया कि बालेन शाह की सरकार की कहना है कि उनकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां राहत और बचाव कार्य करने में सक्षम है.
हालांकि, नेपाल ने शुक्रवार (28 अगस्त, 2026) को इस बात का खंडन किया है कि उसने मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद लेने से इनकार किया है. नेपाल ने कहा कि वह अपने सुरक्षा बलों की ज्यादा से ज्यादा तैनाती को प्राथमिकता देना चाहता है, क्योंकि वे स्थानीय पर्यावरण की परिस्थितियों और दुर्गम इलाकों से परिचित हैं.
नेपाल में आई भीषण बाढ़ में लापता लोगोें की लिस्ट में भारत, चीन, अमेरिका, मलेशिया, यूक्रेन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और कई अन्य देशों के लोगों का नाम शामिल है. हालांकि, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि नेपाल ने मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद को पूरी तरह से नहीं ठुकराया है. उन्होंने कहा कि अगर बचाव कार्यों में चुनौतियां आती है तो सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय और दूसरे देशों से सहायता लेंगे.
द हिमालयन टाइम्स के अनुसार, शिशिर खनाल ने कहा कि जहां भी हमें अतिरिक्त तकनीकी क्षमता की आवश्यकता होगी, हम जरूरत के अनुसार सहयोग लेंगे. नेपाल सरकार के इस बयान हैरान करने वाला लगता है, लेकिन उसने ये फैसला 2015 में भूकंप के बाद के कड़वे अनुभवों से सबक लेते हुए लिया है.
2015 के अनुभवों से नेपाल ने लिया सबक
नेपाली विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, 2015 के भूकंप के बाद बड़ी संख्या में विदेशी बचाव दल नेपाल पहुंचे थे. उस दौरान अलग-अलग देशों की टीमों के बीच समन्वय (Coordination) की कमी, प्रबंधन की समस्याएं और देशों के बीच एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ देखने को मिली थी. इस वजह से राहत और बचाव कार्यों को व्यवस्थित तरीके से चलाने में नेपाल सरकार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था.
इसी पुराने कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए, प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने इस बार राहत और बचाव कार्य को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखने का फैसला किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह निर्णय नेपाली सेना और नेपाल पुलिस की सिफारिश पर लिया गया है. सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को आश्वस्त किया है कि देश की अपनी सेना और पुलिस बल इस कठिन इलाके में खोज और बचाव अभियान को प्रभावी ढंग से अंजाम दे सकते हैं. नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बताया, हमें चीन और अन्य मित्र देशों से सहायता और अपनी टीमें भेजने के इसी तरह के प्रस्ताव मिले थे, लेकिन हमें उन अनुरोधों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करना पड़ा.
भारत से मदद स्वीकार रहा नेपाल
हालांकि नेपाल सरकार ने राहत सामग्री, मेडिकल सप्लाई और वित्तीय सहायता के तहत मदद की स्वीकार करने की पुष्टि भी की है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार, नेपाल के टनल में कुछ लोगों के फंसे होने की संभावना है इसलिए भारत वहां टनलिंग के एक्सपर्ट्स के साथ एक टीम भेजने की तैयारी कर रहा है.
उन्होंने बताया, ‘उन्हें (नेपाल) कुछ बेली ब्रिजों की जरूरत है, इसलिए हम पुल भेज रहे हैं. ये ऐसे पुल हैं जिन्हें एक टीम के साथ जल्दी से जोड़ा जा सकता है. कुछ मेडिकल टीमें भी वहां जा सकती हैं. अगर उन्हें NDRF के लोगों की जरूरत होगी तो हम उन्हें भेजेंगे. हमने उन्हें यह विकल्प दिया है. राहत सामग्री लेकर दो विमान पहले ही वहां जा चुके हैं और तीसरा विमान आज उड़ान भरेगा.’
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