
Smart Parenting Tips: बच्चों की परवरिश सिर्फ पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित नहीं होती. बच्चे चाहते हैं कि उनके माता-पिता उनकी बात सुनें, उनकी भावनाओं को समझें और गलती होने पर उन्हें डांटने के बजाय सही रास्ता दिखाएं. घर का माहौल ऐसा हो, जहां बच्चा बिना डर अपनी बात कह सके. इसके लिए रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें काफी काम आ सकती हैं.
1. बच्चे की बात पूरी सुनें
बच्चा स्कूल, दोस्तों या किसी परेशानी के बारे में बता रहा हो, तो उसकी बात बीच में काटने से बचें. तुरंत सलाह देने के बजाय पहले यह समझने की कोशिश करें कि वह क्या महसूस कर रहा है. जैसे बच्चा कहे कि दोस्त ने उससे बात नहीं की, तो “कोई बात नहीं” कहकर बात खत्म करने के बजाय पूछें, “तुम्हें इस बात से बुरा लगा?” इससे बच्चा अपनी भावनाएं खुलकर बताना सीखता है.
2. अच्छे काम पर खुलकर तारीफ करें
बच्चे ने समय पर होमवर्क किया, खिलौने समेटे या घर के किसी काम में मदद की, तो उसकी तारीफ जरूर करें. सिर्फ “गुड बॉय” या “गुड गर्ल” कहने के बजाय बताएं कि आपको उसका कौन सा काम अच्छा लगा. इससे बच्चे को अपने अच्छे व्यवहार की वजह समझने में मदद मिलती है.
3. गलती पर बच्चे को नहीं, उसके व्यवहार को समझाएं
बच्चों से गलतियां होना सामान्य है. ऐसे में “तुम बहुत लापरवाह हो” जैसे शब्दों से बचना चाहिए. इसके बजाय गलती के बारे में शांत तरीके से समझाएं. अगर बच्चे ने सामान फैला दिया है, तो कहें, “खेलने के बाद खिलौने अपनी जगह पर रखना जरूरी है.” इससे बच्चा बिना अपमानित हुए अपनी गलती सुधारना सीख सकता है.
4. रोज कुछ समय बच्चे के साथ बिताएं
क्वालिटी टाइम के लिए किसी खास प्लान की जरूरत नहीं. बच्चे के साथ कहानी पढ़ना, खेलना, टहलना या बस बैठकर बातें करना भी काफी है. इस दौरान फोन और टीवी को दूर रखकर बच्चे पर ध्यान दें. उसे यह एहसास होना चाहिए कि उस समय माता-पिता का पूरा ध्यान उसी पर है.
5. प्यार के साथ नियम भी तय करें
बच्चों को हर बात की छूट देना सही नहीं है. घर में उनकी उम्र के हिसाब से कुछ आसान और साफ नियम होने चाहिए. लेकिन नियम समझाते समय डराने या हर बात पर डांटने के बजाय शांत भाषा का इस्तेमाल करें. प्यार के साथ तय की गई सीमाएं बच्चे को जिम्मेदारी समझने में मदद कर सकती हैं.
अच्छी पैरेंटिंग का मतलब परफेक्ट माता-पिता बनना नहीं है. जरूरी यह है कि बच्चा घर में खुद को सुरक्षित, सुना और समझा हुआ महसूस करे. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव से माता-पिता और बच्चे के बीच भरोसा मजबूत हो सकता है. हालांकि हर बच्चा अलग होता है, इसलिए किसी भी पैरेंटिंग तरीके का असर उसकी उम्र और स्वभाव के अनुसार अलग हो सकता है. गंभीर व्यवहार या भावनात्मक परेशानी होने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है.
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