बीते हफ्तों में सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब पर बेहद तेजी से फैलने वाला दावा सामने आया है. अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ जंग में व्यस्त हो गए हैं, जिस वजह से मिडिल ईस्ट के देशों से ‘बादलों की चोरी’ (Cloud Theft) करने की उनकी कोशिशों में रुकावट आई है और इसीलिए कुछ इलाकों में अचानक बारिश हो रही है. हालांकि, साइंस और मौसम विभागों के अधिकारी कहते हैं कि ऐसी कोई भी तकनीक मौजूद नहीं है जिससे कोई देश किसी दूसरे देश के बादलों को ‘चुरा’ सके. लेकिन बिना आग के धुआं नहीं होता, तो फिर यह बात उठी कहां से और क्या वाकई बादलों की चोरी हो सकती है? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: बादल चोरी के इस अनोखे दावे की शुरुआत कैसे और कहां से हुई?
जवाब: इस दावे को हवा देने वाले एक प्रमुख व्यक्ति हैं इराकी सांसद अब्दुल्ला अल-खेकानी. उन्होंने टीवी चैनल अल-रशीद टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि पड़ोसी देश तुर्किये और ईरान ने विमानों की मदद से बादलों को ‘तोड़े जाने’ और ‘चुराए जाने’ के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं. उनका दावा था कि अब इराक में दोबारा बारिश इसलिए हो रही है क्योंकि अमेरिका ईरान के साथ जंग में उलझा हुआ है. खेकानी ने इसे मौसमी हथियार बताया.
सोशल मीडिया पर यह भी अफवाह उड़ी कि तुर्किये में फरवरी 2026 में 66 साल का बारिश का रिकॉर्ड इसलिए टूटा क्योंकि युद्ध के चलते उसकी हवाई सीमाएं बंद थीं और अमेरिका वहां के बादल नहीं चुरा पाया. एक अन्य दावे में कहा गया कि ईरान की दशकों की सबसे भीषण सूखा अमेरिकी संपत्तियों पर हमलों के बाद ‘पांच दिन में खत्म’ हो गई. हालांकि, खेकानी ने दावों का सबूत नहीं दिया.

सवाल 2: साइंस और एक्सपर्ट्स ‘बादल चोरी’ के दावे के बारे में क्या कहते हैं?
जवाब: एक्सपर्ट्स और साइंटिस्ट इस दावे को पूरी तरह से गलत और अवैज्ञानिक बताते हैं. इराक के मौसम विज्ञान संगठन के प्रवक्ता आमेर अल-जाबिरी ने बीबीसी को बताया कि यह दावा ‘न तो वैज्ञानिक है और न ही तार्किक.’ उन्होंने बताया कि सितंबर 2025 में ही, यानी 28 फरवरी 2026 को युद्ध शुरू होने से कई महीने पहले, यह भविष्यवाणी कर दी गई थी कि 2026 में इराक में सामान्य से ज्यादा बारिश होगी.
यूनाइटेड नेशंस (UN) के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक कवेह मदनी इस गलतफहमी की मुख्य वजह ‘मौसम प्रणाली की समझ की कमी’ को मानते हैं. खलीफा यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डायना फ्रांसिस इसे एक उदाहरण से समझाती हैं कि मानव निर्मित बारिश की तकनीक (क्लाउड सीडिंग) ‘पहले से मौजूद बादल को बस एक हल्का सा धक्का देने जैसा है, न कि मौसम को पूरी तरह कंट्रोल करना.’
वायोमिंग यूनिवर्सिटी के डॉ. जेफ फ्रेंच के मुताबिक, भले ही एक इलाके में क्लाउड सीडिंग की जाए, तो भी दूसरे इलाके की बारिश पर इसका प्रभाव बहुत मामूली और बारिश के सामान्य उतार-चढ़ाव से ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं होगा.’ कुल मिलाकर, मौसम प्रणालियों की दिशा या तीव्रता को सीधे कंट्रोल करने वाली कोई भी तकनीक मौजूद नहीं है.

सवाल 3: अगर बादलों की चोरी नाम की कोई चीज नहीं तो लोग क्यों यकीन कर रहे हैं?
जवाब: मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों के साथ-साथ एक तकनीकी कारण भी इसके लिए जिम्मेदार है. ‘क्लाउड सीडिंग’ नाम की एक वास्तविक तकनीक मौजूद है, जिसका इस्तेमाल चीन, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और ईरान जैसे कई देश करते हैं. इस तकनीक में विमानों से बादलों पर सिल्वर आयोडाइड जैसे महीन कण छिड़के जाते हैं ताकि बारिश को बढ़ावा मिल सके. लेकिन वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि यह तकनीक बादलों को ‘चुरा’ नहीं सकती. इससे मौजूदा बादलों से अधिकतम 15 प्रतिशत तक ही अतिरिक्त बारिश करवाई जा सकती है.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्चर डॉ. सारा स्मिथ कहती हैं, ‘जटिलता और अनिश्चितता अक्सर षड्यंत्रकारी सोच को आकर्षित करती है. लोग पैदा हुए खालीपन को किसी सरल और संतोषजनक चीज से भर देते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे असली कहानी से दूर हो जाते हैं.’ जॉर्डन की डॉ. इसरा तरौनेह इस बात पर जोर देती हैं कि पानी की कमी के बारे में बढ़ती सार्वजनिक चिंता लोगों को ऐसी अफवाहों पर यकीन करने के लिए और ज्यादा संवेदनशील बना देती है.
अमेरिका के कॉल्बी कॉलेज के वायुमंडलीय वैज्ञानिक प्रोफेसर जेम्स फ्लेमिंग कहते हैं, ‘बादल कभी एक जगह नहीं रुकते. ये अस्थायी इकाइयां हैं जो गतिशील वातावरण में बनती और बिखरती रहती हैं. इसलिए भले ही कोई देश सीडिंग करे, इसकी कोई गारंटी नहीं कि बारिश उसी देश में होगी.’

सवाल 4: क्या ‘मौसम हथियार’ पर कोई अंतरराष्ट्रीय कानून है?
जवाब: मौसम को हथियार बनाने पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसे द कन्वेंशन ऑन द प्रोहिबेशन ऑफ मिलिट्री और एनी अदर होस्टाइल यूज ऑफ एनवॉयरमेंटल मॉडिफिकेशन टेक्नीक्स (ENMOD) कहा जाता है. यह 1978 में लागू हुई थी. इस पर अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, जर्मनी और रूस समेत 78 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं. यह संधि किसी भी तरह के पर्यावरणीय हथियार (मौसम बदलने के हथियार) को सैन्य या शत्रुतापूर्ण इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित करती है. लेकिन समस्या यह है:
- यह संधि बहुत कमजोर है. इसमें क्लाउड सीडिंग जैसी आधुनिक तकनीकों पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है.
- इस पर सभी देशों ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं.
- संधि के उल्लंघन की सत्यापन और निगरानी की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है.
यूनिवर्सिटी ऑफ सस्टेनेबिलिटी, इनोवेशन एंड गुड गवर्नेंस के संस्थापक अरविंद वेंकटरमन कहते हैं, ‘जलवायु में किसी भी तरह के हस्तक्षेप या हेरफेर के अपने जोखिम होते हैं. अध्ययन बताते हैं कि कुछ तरीके और सूखा और बाढ़ ला सकते हैं, हमारी खाद्य श्रृंखला को प्रभावित कर सकते हैं और भू-राजनीतिक संघर्ष बढ़ा सकते हैं.’
सवाल 5: तो क्या भविष्य में बादल चोरी पर युद्ध हो सकते हैं?
जवाब: एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर दुनिया ने सख्त नियम नहीं बनाए, तो ‘बादल चोरी’ का आरोप युद्ध का बहाना बन सकता है. केवे मदानी कहते हैं, ‘मौजूदा कानूनी रास्ते और अंतरराष्ट्रीय समझौते बहुत कमजोर हैं. वे उन आधुनिक और अभूतपूर्व समस्याओं से निपटने के लिए काफी नहीं हैं जिनका दुनिया आज सामना कर रही है. इसलिए वे वाकई राष्ट्रों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते.’
अगले दशकों में यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है. पहले से ही, जब एयरस्पेस बंद होती है या किसी देश में अचानक बाढ़/सूखा आता है, तो पड़ोसी देश पर ‘क्लाउड स्टीलिंग’ का आरोप लगाना शुरू हो जाता है.
पूर्व UN प्रमुख बान-की-मून की जलवायु सलाहकार ट्रेसी रेसेक चेतावनी देते हुए कहती हैं, ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय को क्लाउड सीडिंग और अन्य मौसम संशोधन तकनीकों के सुरक्षा जोखिमों पर अंतरराष्ट्रीय नीति को तुरंत मजबूत करने की जरूरत है और जल्द ही.’
वहीं, कुछ एक्सपर्ट्स इसके उलट जवाब देते हैं. उनका मानना है कि बादलों को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह ले जाने, यानी ‘मेघ चोरी’ करने जैसी कोई तकनीक दुनिया में मौजूद नहीं है. इसलिए, इस काल्पनिक चीज की वजह से भविष्य में युद्ध होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. यह एक अफवाह है जो सोशल मीडिया पर फैली है. जैसा कि वायोमिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. जेफ फ्रेंच बताते हैं, ‘भले ही एक जगह क्लाउड सीडिंग करके बारिश बढ़ाने की कोशिश की जाए, तो भी इसका पड़ोसी इलाकों की बारिश पर बहुत कम असर पड़ेगा.’
सवाल 6: तो फिर इस पूरी कहानी का असल और जरूरी पहलू क्या है?
जवाब: इस पूरी कहानी का असली और गंभीर एंगल यह है कि ‘बादल चोरी’ की झूठी कहानी एक बहुत बड़े और वास्तविक खतरे से ध्यान भटकाने का काम करती है. जब ‘बादल चोरी’ जैसी बातें फैलती हैं, तो लोगों का गुस्सा और डर एक काल्पनिक दुश्मन की ओर मुड़ जाता है. जॉर्डन की मुता यूनिवर्सिटी की डॉ. इसरा तरौनेह बताती हैं, ‘ये हालात पानी के संरक्षण को लेकर लोगों की बेचैनी को बढ़ा रहे हैं.’
इसी बेचैनी का फायदा उठाकर बादल चोरी जैसे सरल और साजिशी सिद्धांत फैलते हैं. असल कहानी यह है कि अगर पानी के लिए युद्ध होंगे, तो वह बादलों को लेकर नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद पानी के स्रोतों पर नियंत्रण को लेकर होंगे.
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु पैनल (IPCC) के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से पानी के पहले से सीमित स्रोतों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. जब नदियां सूखती हैं, झीलें सिकुड़ती हैं और भूजल का स्तर गिरता है, तो इन्हीं संसाधनों पर निर्भर देशों और समुदायों के बीच तनाव पैदा होना स्वाभाविक है. यही वह असली और गंभीर लड़ाई है जिसके लिए दुनिया को अभी से तैयार रहने और समाधान खोजने की जरूरत है, न कि ‘बादल चोरी’ जैसी काल्पनिक कहानियों पर ध्यान देने की.


