ब्रिक्स की बैठक पर तेल के बढ़ते दामों का असर पड़ना तय है. ब्रिक्स की एकता में तेल के दाम दरार पैदा कर सकते हैं. अमेरिका के प्रभुत्व वाले ग्लोबल ऑर्डर नई शक्ल देने की कोशिश तो है, लेकिन युद्ध और तेल के बढ़ते दाम इन कोशिशों की परीक्षा ले रहे हैं.
एक तरफ चीन, रूस, ब्राजील के साथ भारत है, जो ब्रिक्स के जरिए अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दुनिया की निर्भरता को कम करना चाहते है, लेकिन ब्रिक्स के कुछ सदस्य यूएई जैसे देश भी हैं, जो अमेरिका के सुरक्षा पार्टनर हैं और ईरान के हमले के निशाने पर हैं, जो खुद ब्रिक्स का सदस्य है.
ईरान दिखाना चाहता है कि पश्चिम के प्रतिबंधों ने उसे अकेला नहीं किया है. अमेरिका के साथ युद्ध में होर्मुज को हथियार बनाकर ईरान ने तेल का व्यापार थाम सा दिया है. दूसरी तरफ ब्रिक्स में ऐसे सदस्य देश भी हैं जिनकी रुचि ऊर्जा के स्थिर आवागमन और तेल के कम दामों में है.
भारत के लिए ये सम्मेलन दुनिया की राजनीति का संतुलन बनाने का नाजुक खेल है. चीन भारत का प्रतिद्वंदी है और ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों में अकेला ऐसा है जो चाहता है कि दुनिया में चीन की दखल कम हो. मोदी रूस के साथ दोस्ती दिखाते नजर आ सकते हैं, लेकिन खुले तौर पर अमेरिका के खिलाफ भी नजर नहीं आ सकते.
ब्रिक्स के सदस्य देशों में दुनिया की लगभग आधी आबादी रहती है और दुनिया के आर्थिक उत्पादन का 40 फीसदी यहीं से आता है. लेकिन एक ग्रुप के तौर पर ये साबित करने में कई बार ब्रिक्स फिसल गया है कि ब्रिक्स के सभी सदस्यों का मकसद एक ही है.
चीन, रूस और ईरान ब्रिक्स को एक वैकल्पिक वर्ल्ड ऑर्डर को पेश करने के अवसर के तौर पर देखते हैं जो अमेरिका के दबदबे के सामने खड़ा हो सके, लेकिन ब्रिक्स के दूसरे सदस्य देशों के अमेरिका से नजदीकी संबंध हैं. जैसे UAE में अमेरिका के कई सैन्य बेस मौजूद हैं और इजिप्ट अमेरिका से सैन्य मदद पाने वाला, पश्चिम एशिया में उसका अहम साझेदार है.
ईरान की कोशिश
समिट के जरिए ईरान दिखाने की कोशिश करेगा कि उसे आर्थिक तौर पर अलग थलग करने की अमेरिका की कोशिशों के बावजूद दुनिया में उसके कई मज़बूत साथी मौजूद हैं. ब्रिक्स के कुछ सदस्य देश अमेरिकी प्रतिबंधों से सामना करने में ईरान की मदद भी कर रहे है, जैसे चीन जो ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है.
भारत, चीन और रूस से मजबूत रिश्ते ईरान को अमेरिका का सामना करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इस सबके बावजूद होर्मुज पर ईरान का रुख, ब्रिक्स सम्मेलन में मतभेद की वजह बनना तय है.
पुतिन को मौका
रूस के राष्ट्रपति पुतिन के लिए भी ये समिट एक मौका है कि वो पश्चिम के देशों को बता सकें कि दुनिया में कुच ताकतवर दोस्त उसके साथ खड़े हैं. अमेरिका से रूस को मिलने वाले सामान पर पाबंदी के बाद चीन रूस को वो सामान मुहैया करा रहा है. भारत रूस से तेल खरीद रहा है और ब्राज़ील रूस से खाद खरीद रहा है.
ट्रंप से मीटिंग से पहले शी का दांव
ब्रिक्स सम्मेलन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए भी अहम है. इसके ज़रिए जिनपिंग अमेरिका को दिखा सकते हैं कि उनके पास दुनिया के ज़्यादा बड़े हिस्से का समर्थन है न कि कुछ चुनिंदा अमीर देशों का. जिनपिंग की इसी महीने होने वाली अमेरिका यात्रा में ये संदेश जिनपिंग की स्थिति को मजबूत करेगा.
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