जंस्कार जिले का कुमिक गांव लद्दाख का पहला विरासत गांव (हेरिटेज विलेज) बन गया है। इस गांव की सांस्कृतिक विरासत को समझते हुए उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने जंस्कार महोत्सव पर इसे एक नई पहचान दी। ये गांव दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियों का खजाना है।
जंस्कार घाटी में 13,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित कुमिक अपने पारंपरिक मिट्टी के घरों, पवित्र स्थलों और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है। वर्तमान में इस गांव में 55 घर हैं। यह गांव समृद्ध बौद्ध धार्मिक ग्रंथ परंपरा के संरक्षण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसकी विरासत केवल उसकी भौतिक संरचनाओं तक भी सीमित नहीं है।
कुमिक गांव में पारंपरिक घर, पवित्र स्थल, कृषि पद्धतियां, बौद्ध परंपराएं, प्राचीन पांडुलिपियां और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक ज्ञान परंपरा आज भी गांव के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यहां दुर्लभ कंजूर पांडुलिपियों सहित तिब्बती बौद्ध धर्म से संबंधित कई महत्वपूर्ण ग्रंथ संरक्षित हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान के हस्तांतरण की लंबी परंपरा की झलक प्रस्तुत करते हैं।
उपराज्यपाल ने कहा कि कुमिक केवल समय में जमे हुए किसी स्मारक का नाम नहीं है बल्कि यह एक जीवंत और जीवंतशील विरासत है। फुगताल बो-यिग में भी कुमिक का उल्लेख मिलता है। यह पहल केंद्र सरकार के ‘विकास भी, विरासत भी’ के दृष्टिकोण को भी मजबूती देती है।
हिमालयी पर्यावरण की नाजुक स्थिति की भी गवाह
कुमिक की कहानी केवल उसकी सांस्कृतिक संपन्नता की नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पर्यावरण की नाजुक स्थिति की भी गवाह है। स्थानीय कहावत “खा कुमिक, छू शीला” जल पर समुदाय की अत्यधिक निर्भरता को दर्शाती है। यह कहावत कुमिक गांव के लोगों के दुर्भाग्य और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दर्शाती है। कुमिक गांव जिस पहाड़ के नीचे बसा है, उसके ऊपर का ग्लेशियर पिघल कर सिकुड़ गया है। अब उस बचे हुए ग्लेशियर का जो भी पानी पिघलता है, वह पहाड़ के ढलान के कारण दूसरी तरफ बहकर शीला नाम के गांव में चला जाता है।
- विरासत गांव घोषित करने का उद्देश्य हिमालयी समुदायों की मजबूती और उन सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय आधारों के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करना है जो आज भी उनके जीवन को सहारा देते हैं
- जंस्कार के मशहूर फुगताल मठ के प्राचीन ऐतिहासिक दस्तावेजों फुगताल बो-यिग में भी कुमिक का उल्लेख मिलता है। कंजूर ग्रंथों सहित यहां संरक्षित महत्वपूर्ण पांडुलिपियां इस क्षेत्र की सदियों पुरानी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं को दर्शाती हैं


