जब लंका जलती है, तो लोग अक्सर उस विभीषण को ढूंढते हैं जिसने घर का भेद दिया। राजनीति में भी जब कोई बड़ी पार्टी अचानक ताश के पत्तों की तरह ढहती है, तो जनता सबसे पहले एक ‘विलेन’ की तलाश करती है। इस वक्त पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में भी यही हो रहा है। हर तरफ एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और उद्धव ठाकरे के सिपहसालार संजय राउत ही अपनी-अपनी पार्टियों को इस हाल में पहुंचाने के असली जिम्मेदार हैं? हालांकि, राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। इस टूट के पीछे अंदरूनी कमजोरी, पुरानी नाराजगी और बाहरी दबाव का एक पूरा चक्रव्यूह काम कर रहा है। आइए, इसे बेहद आसान भाषा में समझते हैं।

टीएमसी में विद्रोह: क्या वाकई अभिषेक बनर्जी बने विलेन?
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन जून 2026 में हुआ यह विद्रोह उनके इतिहास की सबसे बड़ी संगठनात्मक हार है। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायक और 20 लोकसभा सांसद एक साथ बागी हो गए। हैरान करने वाली बात यह है कि इन बागियों का गुस्सा ममता बनर्जी पर नहीं, बल्कि उनके भतीजे और पार्टी के नंबर दो नेता अभिषेक बनर्जी पर फूटा है।
बागी नेताओं का सीधा आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने पूरी पार्टी को ‘आई-पैक’ नाम की एक कॉर्पोरेट चुनावी एजेंसी के हवाले कर दिया था। जो नेता वर्षों से जमीन पर लाठियां खाकर पार्टी को सत्ता में लाए थे, उन्हें अचानक एक प्राइवेट कंपनी के अफसरों के इशारों पर चलना पड़ रहा था। टिकट बांटने से लेकर संगठन के हर छोटे-बड़े फैसले में पुराने नेताओं को दरकिनार किया गया, जिससे उनका स्वाभिमान आहत हुआ। बागी नेता खुलकर कह रहे हैं कि वे ममता दीदी का सम्मान करते हैं, लेकिन अभिषेक का कॉर्पोरेट नेतृत्व उन्हें स्वीकार नहीं है।

इस गुस्से को हवा देने का काम किया 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव ने, जहां भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में टीएमसी को करारी शिकस्त दी। इस हार ने पार्टी के भीतर अभिषेक की रणनीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। रही-सही कसर कोयला और शिक्षक भर्ती जैसे घोटालों में ईडी और सीबीआई की बढ़ती जांच ने पूरी कर दी। कई दागी नेताओं को लगा कि अगर जेल जाने से बचना है, तो पाला बदलना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

क्या संजय राउत की वजह से टूटी पार्टी?
महाराष्ट्र की कहानी भी बंगाल से अलग नहीं है। साल 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद जून 2026 में उद्धव ठाकरे को दूसरा सबसे बड़ा झटका लगा है। इस बार उनके बचे हुए नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसद बागी होकर शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। यह बगावत पूरी कानूनी गणित के साथ की गई है, क्योंकि ठीक दो-तिहाई (66.6%) सांसद टूटने की वजह से दलबदल कानून के तहत इनकी सांसदी सुरक्षित रहेगी। इन बागी सांसदों का सीधा निशाना संजय राउत की कार्यशैली और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर है। नेताओं का आरोप है कि संजय राउत जैसे गिने-चुने चेहरों के अत्यधिक प्रभाव के कारण उद्धव ठाकरे से मिलना आम कार्यकर्ताओं और सांसदों के लिए नामुमकिन हो चुका था। जमीन का सच ठाकरे परिवार तक पहुंचने ही नहीं दिया गया और टिकटों का बंटवारा बंद कमरों में मनमाने ढंग से हुआ।

दूसरा बड़ा कारण विचारधारा का भ्रम रहा। कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन में रहने के कारण शिवसेना-यूबीटी के सांसद अपने ही क्षेत्रों में घिर रहे थे, क्योंकि उनका पारंपरिक वोटर प्रखर हिंदुत्ववादी है। सांसदों को लगा कि अगर वे इसी गठबंधन में रहे, तो उनका राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इसके अलावा, सत्ताधारी महायुति सरकार ने विपक्षी सांसदों के इलाकों में विकास फंड रोक दिए थे। अपने क्षेत्र में काम न करा पाने और फंड की किल्लत के कारण सांसदों ने सत्ता पक्ष के साथ जाना बेहतर समझा।

‘दीदी’ की विरासत और भतीजे का दखल
ममता बनर्जी भारतीय राजनीति का वह कद्दावर चेहरा हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में वामपंथ के 34 साल पुराने अभेद्य किले को अपने अकेले के दम पर ढहा दिया था। वे लाठियां खाकर, कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में शामिल होकर जमीन से ‘दीदी’ बनीं और लगातार तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं। उनकी राजनीतिक विरासत सीधे जनता और कार्यकर्ताओं से जुड़ी थी। लेकिन सवाल उठता है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि उनके रहते हुए भी 58 विधायक और 20 सांसद बगावत कर गए?
राजनीतिक पंडितों की मानें तो ममता बनर्जी का अपनी पार्टी से कंट्रोल खत्म नहीं हुआ था, बल्कि उन्होंने संगठन चलाने की पूरी चाबी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को सौंप दी थी। अभिषेक बनर्जी पार्टी में ‘कॉर्पोरेट स्टाइल’ और ‘आई-पैक’ जैसी मैनेजमेंट एजेंसी को ले आए। नतीजा यह हुआ कि जो पुराने नेता वर्षों से ममता दीदी के साथ जमीन पर पसीना बहा रहे थे, उन्हें अचानक एक प्राइवेट कंपनी के अफसरों के इशारों पर चलना पड़ा। टिकट बांटने से लेकर संगठन के फैसलों तक में पुराने और वफादार नेताओं को दरकिनार किया जाने लगा। ममता बनर्जी ने इस जमीनी नाराजगी से आंखें मूंद लीं और जब 2026 के चुनाव में पार्टी हार गई, तो बरसों से घुट रहे नेताओं का सब्र टूट गया।
‘मातोश्री’ का वीआईपी कल्चर और सलाहकारों की दीवार
दूसरी तरफ, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की कहानी बिल्कुल अलग बैकग्राउंड से आती है। उद्धव ठाकरे को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पास बालासाहेब ठाकरे जैसा कट्टर हिंदूवादी नाम और ‘मातोश्री’ का वह रसूख था, जहां कभी महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े-बड़े फैसले हुआ करते थे। उद्धव ठाकरे ने महाविकास अघाड़ी बनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तो हासिल कर ली, लेकिन यहीं से उनकी जमीनी पकड़ ढीली होने लगी। दावा किया जाता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे आम विधायकों और सांसदों के लिए पूरी तरह पहुंच से बाहर हो गए।
यह भी दावा किया जाता है कि उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी का पूरा दारोमदार संजय राउत जैसे कुछ चुनिंदा सलाहकारों की टोली पर छोड़ दिया। इसका नुकसान यह हुआ कि जमीन का कड़वा सच और विधायकों की फरियाद कभी उद्धव ठाकरे तक पहुंच ही नहीं पाई। जब एकनाथ शिंदे ने पहली बगावत की, तब भी उद्धव ने अपने रवैये में सुधार नहीं किया। कांग्रेस-एनसीपी के साथ रहने से पार्टी का कोर हिंदूवादी वोटर पहले ही छिटक रहा था, और ऊपर से सरकार न होने के कारण सांसदों को विकास फंड मिलना भी बंद हो गया।

