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दोपहर करीब डेढ़ बजे का वक्त था। रविवार होने के कारण सत्य निकेतन की गलियों में रोज की अपेक्षा चहल-पहल कम थी। तभी अचानक तेज धमाका हुआ और देखते ही देखते करीब 80-90 गज में बनी पांच मंजिला इमारत भरभराकर जमीन पर आ गिरी। कुछ ही पलों में पूरी गली धूल के गुबार से भर गई। सामने खड़े लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। आसपास के लोगों को लगा जैसे भूकंप आ गया हो। चीख-पुकार के बीच हर कोई इधर-उधर भागने लगा।

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Delhi building collapse
– फोटो : PTI
मंदिर भी आई चपेट में
मलबा आसपास के घरों और दुकानों तक फैल गया। सामने शिव मंदिर की दीवार भी इसकी चपेट में आ गई। एक दुकान के भीतर इमारत का स्लैब आ गिरा। दुकान के आगे रखा रैक रमेश कुमार और उनके दोनों बच्चों पवन व शिवम के लिए ढाल बन गया। हादसे के करीब एक घंटे बाद भी दोनों बच्चे डरे-सहमे थे।

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दिल्ली मोती बाग हादसा
– फोटो : PTI
जहां दोस्त रहते थे, वहां अब मलबे का पहाड़
इमारत गिरने की खबर मिलते ही आसपास के पीजी में रहने वाले युवा मौके की ओर दौड़े। आकर्ष भी अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा। सामने का मंजर देखकर कुछ पल के लिए सभी सन्न रह गए। जिस इमारत में उनके दोस्त रहते और आते-जाते थे, उसकी जगह अब मलबे का पहाड़ था। नीचे कारें दबी थीं और चारों तरफ टूटे सरिये, स्लैब और धूल बिखरी थी।

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दिल्ली के मोती बाग में गिरी इमारत
– फोटो : PTI
मलबे के भीतर से दे रही थी आवाज सुनाई
धूल कुछ कम हुई तो मलबे के भीतर से लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं। यही आवाजें वहां खड़े युवाओं के लिए उम्मीद बन गईं। उन्हें भरोसा था कि उनके साथी अंदर हैं और जिंदा हैं। कुछ युवा बैरिकेड के पास खड़े होकर बचाव दल की हर गतिविधि पर नजर रखे रहे, तो कुछ मोबाइल पर लगातार अपने दोस्तों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे।

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Delhi building collapse
– फोटो : PTI
एक-एक पल भारी, हर हलचल पर टिक जातीं निगाहें
सबसे पहले बाहर की तरफ फंसे तीन बच्चों को मलबे से निकाला गया। तीनों गंभीर रूप से घायल थे। उन्हें देखते ही एंबुलेंस की ओर ले जाया गया। इसके बाद पुलिस, दमकल और एनडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं। सरिये और लोहे की रेलिंग काटकर बचाव अभियान तेज किया गया। लेकिन मलबे के सामने खड़े युवाओं का इंतजार खत्म नहीं हुआ। उनके दोस्त अब भी अंदर थे। बचाव दल जब मलबे का कोई हिस्सा हटाता तो उम्मीद बंधती कि शायद अगली बार उनका साथी बाहर आएगा। फिर कुछ देर काम रुकता तो बेचैनी और बढ़ जाती। बालकनियों में खड़े युवा नीचे चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन को लगातार देखते रहे। उस दोपहर मलबे के नीचे सिर्फ इमारत नहीं थी, कई दोस्तों की दुनिया दबी थी। ऊपर खड़े साथियों की नजरें उसी मलबे पर टिकी थीं और हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था-अंदर फंसे दोस्त कब बाहर आएंगे?


