अमेरिका में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोलने वाले ग्राहम बिल पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हस्ताक्षर करने की तैयारी में हैं। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई को बताया कि राष्ट्रपति इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रहे हैं। इसी बीच भारत ने अमेरिकी दबाव के बीच अपनी ऊर्जा नीति का मजबूती से बचाव किया है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि देश की ऊर्जा खरीद किसी भू-राजनीतिक पक्ष से जुड़ी नहीं, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों के लिए पर्याप्त, सस्ती और निर्बाध ऊर्जा सुनिश्चित करना एक ‘बुनियादी राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ है।
100% तक टैरिफ का प्रावधान: विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। हालांकि, विधेयक पारित होते ही टैरिफ अपने आप लागू नहीं होंगे; कुछ शर्तें पूरी होने पर राष्ट्रपति को कार्रवाई करने का अधिकार मिलेगा।
भारत का ऊर्जा तर्क: क्वात्रा ने कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरत विकास की बुनियादी आवश्यकता है और देश को अपने लोगों के लिए भरोसेमंद, सस्ती तथा निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी है।
भारत की ऊर्जा जरूरत इतनी अहम क्यों है?
सोशल मीडिया मंच एक्स पर ‘पीपुल फर्स्ट: व्हाट ड्राइव्स इंडियाज एनर्जी इम्पेरेटिव’ शीर्षक से पोस्ट की गई शृंखला में क्वात्रा ने कहा कि ऊर्जा 1.4 अरब भारतीयों के लिए रणनीतिक जरूरत और विकास की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था और तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। इसके बावजूद एक औसत भारतीय की ऊर्जा खपत वैश्विक औसत के एक-तिहाई से भी कम और औसत अमेरिकी की खपत की करीब एक-दसवीं है। उनके मुताबिक, यही अंतर बताता है कि भारत की ऊर्जा जरूरत आगे भी बढ़ती रहेगी।
घरों से उद्योग तक असर: क्वात्रा के अनुसार भरोसेमंद और सस्ती ऊर्जा घरों, खेतों, अस्पतालों, स्कूलों, कारखानों और परिवहन को चलाने के लिए जरूरी है। इससे लोगों की आजीविका और आर्थिक विकास भी जुड़ा है।
तेल आयात पर निर्भरता: भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल और करीब आधी प्राकृतिक गैस आयात करता है। ऐसे में देश के लिए विदेशों से पर्याप्त, सस्ती और लगातार ऊर्जा हासिल करना अहम है।
क्वात्रा ने भारत की नीति को ‘राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ क्यों बताया?
राजदूत क्वात्रा ने कहा कि भारत की ऊर्जा खरीद का आधार देश के लोगों की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘हमारी खरीद एक बुनियादी राष्ट्रीय जिम्मेदारी को दर्शाती है, अपने लोगों के लिए पर्याप्त, सस्ती और निर्बाध ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिए अपनी सीमाओं से बाहर देखना। उनका यह बयान अमेरिकी कांग्रेस के ताजा फैसले के बाद भारत के ऊर्जा सुरक्षा संबंधी रुख को स्पष्ट करता है।
भारत सरकार ने अमेरिकी विधेयक पर क्या कहा?
भारत सरकार ने कहा कि उसने अमेरिकी कांग्रेस में सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित होने का संज्ञान लिया है और इस मामले में आगे के घटनाक्रम पर नजर रख रही है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए देश बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीद जारी रखेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है और भारत ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को भी स्पष्ट रूप से सामने रखा है।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने के लिए दृढ़ है। सरकार इन घटनाक्रमों के प्रभाव से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी।
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पहले से दबाव में चल रहे भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर?
नया अमेरिकी विधेयक ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर पहले से दबाव बना हुआ है। अमेरिका ने अगस्त में भारतीय सामान पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जिसे पहले से लागू शुल्क के ऊपर लगाया गया और इसे भारत की रूसी तेल खरीद से सीधे जोड़ा गया था। इससे कुछ भारतीय निर्यात पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस बीच, फरवरी में दोनों देशों ने पारस्परिक और पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापार के लिए एक अंतरिम समझौते की रूपरेखा पर सहमति की घोषणा की थी। दोनों देश व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत के उन्नत चरण में हैं और सितंबर के अंत में विस्कॉन्सिन में होने वाली जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक से इतर आगे की बातचीत होने की उम्मीद है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में ट्रंप प्रशासन की व्यापक टैरिफ व्यवस्था के एक बड़े हिस्से को अमान्य कर दिया था। मई में एक अमेरिकी संघीय अदालत ने 10 प्रतिशत के व्यापक वैश्विक टैरिफ को भी खारिज कर दिया था। अमेरिकी सांसदों के एक द्विदलीय समूह ने इन आपातकालीन टैरिफ को वापस लेने की मांग वाला अलग प्रस्ताव भी पेश किया है और कहा है कि इनसे आपूर्ति शृंखला प्रभावित होती है तथा अमेरिकी उपभोक्ताओं की लागत बढ़ती है।


