दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे तीखे व्यापारिक तनाव और टैरिफ वॉर के बीच एक राहत भरी खबर आई है. वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में हुई शिखर वार्ता के बाद दोनों देशों ने $60 अरब के व्यापार पर टैरिफ घटाने का बड़ा फैसला लिया है. इस कदम के तहत दोनों देश एक-दूसरे के $30-$30 अरब (करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये) के गैर-संवेदनशील सामानों को आयात शुल्क में रियायत देंगे. हालांकि, अमेरिका और चीन के बीच यह नरमी भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है. हालांकि भारत के लिए कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं.
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बीते कुछ समय से दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी तनावपूर्ण रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और आक्रामक आर्थिक नीतियों के चलते दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर भारी-भरकम दंडात्मक शुल्क लगा दिया था. इस टैरिफ वॉर के कारण अमेरिका में चीनी आयात पर औसतन शुल्क काफी बढ़ गया था, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी कृषि और ऊर्जा उत्पादों पर कड़ी पाबंदियां लगा दी थीं. इस ट्रेड वॉर ने ग्लोबल सप्लाई चेन को प्रभावित किया था और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में भारी गिरावट दर्ज की गई थी.
किन-किन सामानों पर टैरिफ में छूट
चीन के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, इस नए समझौते के तहत चीन अमेरिकी मक्का, गेहूं, ज्वार, मांस, डेयरी, वनस्पति तेल, समुद्री भोजन, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल उपकरणों पर लगने वाले आयात शुल्क में कटौती करेगा. इसके साथ ही चीन ने अमेरिका से 2027 और 2028 में सालाना 10 मिलियन मीट्रिक टन कोयला खरीदने पर भी सहमति जताई है. हालांकि, इस रियायती लिस्ट से सोयाबीन, एलएनजी और तेल को बाहर रखा गया है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने चीन से आने वाले छोटे घरेलू उपकरणों (जैसे कॉफी मेकर और टोस्टर), बर्तन, चादरें, खिलौने, पटाखे, आर्टिफिशियल फूल और खिलौनों पर टैरिफ कम करने की बात कही है.
ट्रेड वॉर को रोकने के लिए दोनों पक्षों ने ‘ट्रेड ट्रूस’ को 10 जनवरी तक बढ़ाने का निर्णय लिया है. चीनी वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, दो महीने का यह विस्तार दोनों देशों को मौजूदा व्यवस्था का मूल्यांकन करने और आर्थिक मुद्दों को सुलझाने के लिए एक स्थिर नीतिगत माहौल देगा. इस बीच दोनों देशों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए कम्युनिकेशन चैनल बनाने, वित्तीय सेवाओं की मंजूरी देने और फ्लाइट्स की संख्या बढ़ाने जैसे फैसलों पर भी सहमति जताई है.
हालांकि इस समझौते के बावजूद निवेशकों का भरोसा पूरी तरह नहीं लौट सका है. सोमवार को चीनी शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली और ब्लू-चिप इंडेक्स 2 फीसदी से अधिक टूट गया. अमेरिकी संसद द्वारा डेटा केंद्रों में चीनी कंपोनेंट्स पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों से टेक्नोलॉजी शेयरों पर दबाव देखा गया, जिससे साफ है कि टैरिफ में ढील के बावजूद दोनों देशों के बीच अंतर्निहित आर्थिक प्रतिद्वंद्विता अब भी बरकरार है.
अमेरिका के लिए क्यों जरूरी है ये डील?
इस टैरिफ कटौती के पीछे अमेरिका की अपनी दो सबसे बड़ी घरेलू जरूरतें भी हैं. पहला- अमेरिका में महंगाई को नियंत्रित रखना, जिसके लिए सस्ते उपभोक्ता सामानों की निर्बाध सप्लाई बेहद जरूरी है. चीनी सामानों पर टैरिफ कम करने से अमेरिकी उपभोक्ताओं को डेली यूज के सामान कम कीमतों पर उपलब्ध हो सकेंगे. दूसरी और सबसे बड़ी रणनीतिक वजह रेयर अर्थ मिनरल्स की आपूर्ति है. रक्षा उपकरण, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन एनर्जी तकनीकों के लिए ये खनिज बहुत जरूरी है और वैश्विक स्तर पर इनका लगभग 70 फीसदी से अधिक उत्पादन और प्रोसेसिंग सिर्फ चीन के नियंत्रण में है. ऐसे में अमेरिका के लिए चीन से सीधे टकराव को सीमित कर व्यापारिक रास्ते खुले रखना एक बड़ी मजबूरी बन गया है.
भारत को क्यों सचेत रहने की जरूरत?
अब तक ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत जो वैश्विक कंपनियां और अमेरिकी खरीदार विकल्प के रूप में भारत का रुख कर रहे थे, अमेरिका-चीन में ट्रेड सामान्य होने पर वे दोबारा चीन का रुख कर सकते हैं. इससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है.
हालांकि इस समझौते के कई रणनीतिक पहलू हैं, लेकिन वैश्विक आर्थिक स्थिरता के दृष्टिकोण से यह भारत के लिए कुछ बड़े अवसर भी ला सकता है. अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव कम होने से ग्लोबल सप्लाई चेन में अनिश्चितता घटेगी और कमोडिटी बाजार में स्थिरता आएगी, जिसका सीधा फायदा भारतीय अर्थव्यवस्था और महंगाई को नियंत्रण करने में होगा.
इसके अलावा, चीन द्वारा अमेरिकी कृषि उत्पादों खासकर विशेषकर सोयाबीन, एलएनजी और तेल को इस टैरिफ छूट की लिस्ट से बाहर रखने के कारण चीन के बाजार में भारतीय कृषि और प्रोसेस्ड फूड निर्यातकों के लिए जगह बनी रहेगी. साथ ही, दोनों देशों द्वारा केवल सीमित और गैर-संवेदनशील उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करने का मतलब है कि हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां लंबे समय तक जोखिमों से बचने के लिए भारत को एक सुरक्षित और भरोसेमंद मैन्यूफेक्चरिंग केंद्र (China+1 अल्टरनेटिव) के रूप में प्राथमिकता देती रहेंगी.

