अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का बड़ा फैसला लिया है। यह कदम अगले 6 से 12 महीनों में पूरा किया जाएगा। पेंटागन ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह फैसला यूरोप में सैन्य जरूरतों और हालात की समीक्षा के बाद लिया गया है।


हालांकि इस फैसले के पीछे केवल सैन्य रणनीति ही नहीं, बल्कि राजनीति और अंतरराष्ट्रीय तनाव भी बड़ा कारण माने जा रहे हैं। खासकर इस्राइल और ईरान युद्ध के बीच अमेरिका और जर्मनी के रिश्तों में आई खटास ने इस फैसले को और अहम बना दिया है।
क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?
- अमेरिका के रक्षा विभाग ने कहा कि यूरोप में अपनी सैन्य स्थिति की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया।
- जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने अमेरिका की ईरान नीति की आलोचना की थी।
- राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की धमकी दे चुके हैं।
- ट्रंप का मानना है कि नाटो देश अमेरिका का पूरा साथ नहीं दे रहे हैं।
- इस्राइल-ईरान युद्ध के बाद अमेरिका अपनी रणनीति बदल रहा है।
कितनी बड़ी है जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी?
- जर्मनी में अभी करीब 36,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।
- इनमें से लगभग 14 प्रतिशत सैनिक अब हटाए जाएंगे।
- जर्मनी में अमेरिका के बड़े सैन्य ठिकाने हैं जैसे रामस्टीन एयर बेस।
- यूरोप और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय भी जर्मनी में ही है।
- जर्मनी में अमेरिका का सबसे बड़ा विदेशी अस्पताल भी मौजूद है।
इस फैसले के क्या होंगे वैश्विक असर?
माना जा रहा है कि यह कदम अमेरिका की वैश्विक ताकत दिखाने की रणनीति का हिस्सा है। इससे यूरोप को अपनी सुरक्षा खुद संभालने का संकेत मिल रहा है। नाटो देशों में पहले से ही इस फैसले को लेकर चिंता थी। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में सुरक्षा का मुद्दा और गंभीर हो गया है। अमेरिका धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी कम करने की दिशा में बढ़ रहा है।
आगे क्या हो सकता है और क्यों बढ़ी चिंता?
ट्रंप पहले भी अपने पहले कार्यकाल में ऐसा कदम उठाने की कोशिश कर चुके थे। उस समय यह योजना लागू नहीं हो पाई थी और बाद में रोक दी गई थी। अब फिर से यह फैसला लागू होने जा रहा है, जिससे नाटो में तनाव बढ़ सकता है। जर्मनी में अमेरिकी परमाणु हथियार भी तैनात हैं, जिससे सुरक्षा और अहम हो जाती है। आने वाले समय में यूरोप को अपनी रक्षा नीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।
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