नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को 18वें BRICS समिट की मेजबानी भारत कर रहा है. एक ही मंच पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान मौजूद हैं. ये तीनों देश पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी जंग के धुर विरोधी पक्षों में खड़े हैं. दुनिया भर में सुन्नी इस्लाम की धुरी माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए ‘चुप्पी’ और ईरान की ‘बहादुरी’ नया परसेप्शन बन गई है. BRICS के विस्तार और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच, पश्चिम एशिया में ताकत का संतुलन तेजी से बदल रहा है. ईरान को एक नए ‘इस्लामी रखवाले’ के रूप में देखा जाने लगा है, लेकिन क्यों और कैसे?
गाजा की जंग और ईरान का ‘रखवाला’ वाला चेहरा
7 अक्टूबर 2023 के बाद से गाजा में जो जंग शुरू हुई, उसने पूरे इस्लामी जगत की सियासत को हिला कर रख दिया. ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के मुद्दे पर सुन्नी अरब शासकों का दबदबा था, लेकिन अब ईरान ने वह जगह ले ली है. ईरान ने न सिर्फ हमास के जरिए गाजा में अपनी मौजूदगी दिखाई, बल्कि अपनी शिया राजनीतिक-धार्मिक विचारधारा को ‘प्रतिरोध’ और ‘शहादत’ के नारे के साथ पेश किया.
चाहे वह शिया हो या सुन्नी दुनिया में आम जनता की नजर में ईरान की छवि एक ऐसे देश की बन गई, जो मुसलमानों की हिमायत के लिए खड़ा होता है. मल्टीडिसिप्लिनरी डिजिटल पब्लिशिंग इंस्टीट्यूट (MDPI) की रिपोर्ट में यह सामने आया है कि सुन्नी राजशाही ने जहां सिर्फ बयानबाजी की, वहीं ईरान ने जमीन पर अपने सहयोगियों के जरिए सक्रिय रुख अपनाया.
इसी वजह से सुन्नी बहुल देशों में भी ईरान की लोकप्रियता बढ़ी है, क्योंकि वहां आम लोग इसे ‘मुसलमानों का रखवाला’ मानने लगे हैं.

सऊदी अरब की परसेप्शन में हार कैसे हुई?
खुद को सुन्नी इस्लाम का केंद्र बताने वाला सऊदी अरब गाजा की जंग में बैकफुट पर था. 2020 के अब्राहम समझौतों के तहत इजरायल के साथ रिश्ते बनाने की कोशिशों ने उसकी छवि को और कमजोर किया. saba.ye के सर्वे के मुताबिक, सऊदी अरब में 96 प्रतिशत लोग इजरायल के साथ संबंधों के सामान्यीकरण के खिलाफ थे.
बड़ी बात यह है कि जब ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग छिड़ी, तो सऊदी अरब को भी ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा. हैरानी की बात यह रही कि सऊदी अरब खुलकर बोल नहीं पाया और उसे चुपचाप नुकसान सहना पड़ा. यही वजह है कि सुन्नी दुनिया में सऊदी अरब की छवि एक ऐसे देश की बनी, जो अपनी ही जमीन पर हमले सहने के बावजूद करारा जवाब देने में नाकाम रहा.
होर्मुज से बाब अल-मंदीब तक: ईरान की चोकपॉइंट पॉलिटिक्स
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ का इस्तेमाल सऊदी अरब को घेरने के लिए किया. दुनिया की सबसे अहम तेल ढुलाई का रास्ता होर्मुज ईरान के कंट्रोल में आ गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज में एक ‘टोल सिस्टम’ बना दिया, जिसमें जहाजों से 20 लाख डॉलर तक वसूला जाता रहा.
इसका सीधा असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर पड़ा. जंग शुरू होने के बाद से चीन को सऊदी के तेल निर्यात में 60 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है, क्योंकि रूसी तेल होर्मुज से होकर नहीं जाता. इसके जवाब में सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर तक तेल भेजना शुरू किया, लेकिन अब वही पाइपलाइन भी खतरे में है.
हूती विद्रोहियों का कहर और बाब अल-मंदीब पर संकट
ईरान के समर्थन वाले यमन के हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंदीब जलडमरूमध्य के आसपास बड़ा हमला बोल दिया है. सितंबर 2026 में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के अभा, नजरान, जीजान और खामिस मुशैत एयरबेस पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इसमें 73 आम नागरिक घायल हुए.
हूती विद्रोहियों ने जुलाई 2026 में सऊदी अरब के खिलाफ ‘समुद्री नाकाबंदी’ का ऐलान कर दिया था. इसके बाद से उन्होंने लाल सागर में सऊदी के जहाजों पर लगातार हमले शुरू कर दिए. 31 अगस्त 2025 को पहली बार हूती विद्रोहियों ने यानबू के तट पर सऊदी अरब के जहाज को निशाना बनाया, जो अब तक का सबसे उत्तरी हमला था.
ईरान का नया प्रॉक्सी नेटवर्क और सऊदी अरब की मजबूरी
ईरान अब इराकी मिलिशियाओं और हूती विद्रोहियों के जरिए सऊदी अरब और खाड़ी के अमेरिकी सहयोगियों पर दबाव बना रहा है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने इराकी मिलिशियाओं की मदद से दो दिवसीय ड्रोन हमले की योजना बनाई और उसे अंजाम दिया.
जवाब में सऊदी अरब और अमेरिका ने इराक में ईरान समर्थित मिलिशियाओं पर हवाई हमले किए, जिसमें कम से कम 20 लड़ाके, 6 ईरानी सलाहकार और एक हूती अधिकारी मारा गया. यह जवाबी कार्रवाई सऊदी अरब की कमजोरी को और उजागर करती है, क्योंकि वह सीधे ईरान पर हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है.
BRICS और बदलती वैश्विक समीकरण
BRICS के विस्तार के बाद ईरान और सऊदी अरब दोनों इस समूह का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों की भूमिका अलग है. ईरान BRICS के मंच का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए कर रहा है, जबकि सऊदी अरब अपनी आर्थिक ताकत के बावजूद सुरक्षा के मामले में कमजोर पड़ता दिख रहा है.
ईरान के होर्मुज में टोल सिस्टम और हूती विद्रोहियों की नाकाबंदी ने सऊदी अरब की आर्थिक रीढ़ पर सीधा असर डाला है. सऊदी अरब की ‘विजन 2030’ योजना, होर्मुज संकट के कारण खतरे में पड़ गई है.
सुन्नी दुनिया में सऊदी अरब की ‘चुप’ और ईरान की ‘बहादुरी’
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज की तारीख में सुन्नी इस्लाम की सबसे बड़ी ताकत माने जाने वाले सऊदी अरब की स्थिति बेहद कमजोर है. गाजा की जंग में ईरान ने जिस तरह से अपनी मौजूदगी दिखाई, उसने सुन्नी दुनिया के आम लोगों के दिलों में जगह बनाई. वहीं खुद को मुस्लिम उम्मा का रखवाला बताने वाला सऊदी अरब, ईरान के हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने में नाकाम रहा.
होर्मुज पर ईरान का कब्जा, बाब अल-मंदीब पर हूती विद्रोहियों की नाकाबंदी और इराक से आ रहे ड्रोन हमलों ने सऊदी अरब को घेर लिया है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब अपनी खोई हुई हैसियत वापस हासिल कर पाएगा या ईरान सुन्नी दुनिया में अपनी नई जगह बनाने में कामयाब हो जाएगा. फिलहाल तो तस्वीर यही कह रही है कि सऊदी अरब की ‘चुप’ और ईरान की ‘बहादुरी’ ने पूरे इस्लामी जगत की सियासत का रुख बदल दिया है.

