अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 8 साल बाद चीन पहुंचे हैं. उनका विमान बीजिंग कैपिटल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लैंड किया, जहां चीनी उपराष्ट्रपति हान जेंग और चीनी डिप्लोमैट शी फेंग ने उन्हें रिसीव किया. वे 15 मई तक बीजिंग में रहेंगे. इससे पहले वे 2017 में चीन गए थे और उसी दौरे के बाद दुश्मनी शुरू हो गई थी. इस दौरे को दोनों देशों के बीच रिश्तों को स्थिर करने का बड़ा मौका माना जा रहा है, हालांकि ईरान युद्ध की वजह से माहौल थोड़ा जटिल है. ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि चीन बड़े पैमाने पर ईरानी तेल खरीदकर तेहरान को आर्थिक सहारा दे रहा है, जबकि चीन इसे अपनी ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा मामला बता रहा है. दूसरी ओर अमेरिकी किसानों की नजरें भी इस दौरे पर टिकी हुई हैं, क्योंकि उन्हें मजबूत ट्रेड डील की उम्मीद है. तो जानते हैं कि ट्रंप की यात्रा का मकसद क्या है और इसमें होने क्या वाला है?
ट्रंप के दौरे का मकसद क्या है?
ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच 7 मुद्दों चर्चा मुमकिन है:
- व्यापार और टैरिफ: दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर अभी भी जारी है. ट्रंप ने पहले चीनी सामान पर भारी टैरिफ की चेतावनी दी थी. अब दोनों पक्ष व्यापारिक तनाव कम करने, नए ट्रेड फोरम बनाने और मौजूदा ट्रेड ट्रूस को बढ़ाने पर बात करेंगे.
- बोइंग विमान डील: रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और चीन के बीच 9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बड़ी डील संभव है. चीन 500 बोइंग 737 MAX, 100 बोइंग 787 ड्रीमलाइनर और कई 777X वाइडबॉडी विमान खरीद सकता है. अगर यह डील हुई तो यह इतिहास की सबसे बड़ी विमान सौदों में से एक होगी.
- सोयाबीन और कृषि उत्पाद: अमेरिकी किसान इस दौरे से बहुत उम्मीद कर रहे हैं. ट्रेड वॉर के दौरान चीन ने ब्राजील से सोयाबीन खरीद बढ़ा दी थी, जिससे अमेरिकी किसानों को नुकसान हुआ. अब चीन फिर से अमेरिकी सोयाबीन और दूसरे कृषि उत्पाद खरीद सकता है.
- रेयर अर्थ मिनरल्स: ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहन, चिप्स, डिफेंस और हाई-टेक इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी हैं. चीन दुनिया का सबसे बड़ा सप्लायर है. दोनों देश इनकी सप्लाई पर ट्रूस बढ़ाने और अमेरिका की निर्भरता कम करने पर चर्चा करेंगे.
- AI, सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी: Nvidia के CEO जेन्सन हुआंग AI चिप्स बेचने की कोशिश में हैं. ट्रंप ने खुद जेन्सन हुआंग को फोन करके दौरे पर बुलाया, क्योंकि वे AI चिप्स के मामले में चीन के साथ बातचीत करना चाहते हैं.
- ईरान युद्ध: यह दौरे का बहुत अहम मुद्दा है. अमेरिका-इजरायल के ईरान के साथ संघर्ष के बीच ट्रंप चीन से ईरानी तेल की खरीद कम करने का दबाव बनाएंगे. चीन ईरान से सस्ता तेल खरीदता है, जो उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है. अमेरिका चाहता है कि चीन तेहरान को आर्थिक सहारा न दे.
- ताइवान: ट्रंप शी से ताइवान को 11 अरब डॉलर के अमेरिकी हथियार पैकेज पर बात करेंगे. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और इसकी कड़ी विरोध करता है.
दुनिया के 17 अमीर कारोबारियों के साथ सफर पर ट्रंप
ट्रंप के साथ एलन मस्क, एप्पल के CEO टिम कुक, बोइंग के CEO रॉबर्ट ‘केली’ ऑर्टबर्ग और एनवीडिया के CEO जेन्सेन हुआंग जैसे 17 कारोबारी शामिल हैं. 13 मई को एलन मस्क ने X पर ट्वीट कर कहा, ‘एयर फोर्स वन पर ट्रंप के साथ सिर्फ जेन्सन और मैं हूं.’ रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप के बीच गुरुवार और शुक्रवार को अलग-अलग दौर की बातचीत होगी.
Just Jensen and I are on AF1
— Elon Musk (@elonmusk) May 13, 2026
तो क्या दोनों देशों की दुश्मनी खत्म हो जाएगी?
पूरी तरह नहीं. दोनों नेता रिश्तों को स्थिर करना चाहते हैं और कुछ बड़े डील करना चाहते हैं, लेकिन तकनीक, ताइवान, सैन्य और AI में कॉम्पिटीशन बना रहेगा. ईरान युद्ध की वजह से कुछ मुद्दों पर ग्रोथ धीमी हो सकती है. फिर भी दोनों पक्ष ‘स्थिरता’ और ‘सहयोग’ पर जोर दे रहे हैं. यह अमेरिका-चीन संबंधों के लिए महत्वपूर्ण कदम है. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तनाव कम होने से ग्लोबल मार्केट्स, व्यापार और सुरक्षा पर असर पड़ेगा. अमेरिकी कारोबारी इस दौरे से चीन में अपने बिजनेस को और मजबूत करने की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि चीन स्थिरता और आर्थिक फायदे चाहता है.
US-इजरायल और ईरान जंग की मौजूदा स्थिति
फरवरी-मार्च 2026 में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए थे. इसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई बड़े नेता मारे गए. ईरान ने जवाबी कार्रवाई में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लगभग बंद कर दिया. इससे वैश्विक तेल सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई. अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग अभी ठंडी पड़ गई है लेकिन सीजफायर ‘लाइफ सपोर्ट’ पर है. ट्रंप ने ईरान के हालिया प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. अमेरिका ईरान को न्यूक्लियर वेपन नहीं बनाने देना चाहता, जबकि ईरान अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव की बात कर रहा है. ऐसे में ट्रंप चीन से ईरानी तेल की खरीद कम करने का दबाव बना रहे हैं क्योंकि चीन ईरान का सबसे बड़ा खरीदार है. हालांकि, ट्रंप ने ट्वीट कर कहा था कि हमें ईरान के मामले में चीन की मदद नहीं चाहिए.
क्या इस मुलाकात से एनर्जी क्राइसिस सॉल्व होगा?
अभी नहीं. होर्मुज ब्लॉकेज की वजह से ब्रेंट क्रूड ऑयल 100-113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. अमेरिका में गैसोलीन 4.50 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर चला गया. दुनिया भर में महंगाई बढ़ी है और कई देशों में ईंधन संकट दिख रहा है. ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात में इस पर बड़ी चर्चा हो सकती है. ट्रंप चीन को अमेरिकी तेल, LNG और एनर्जी प्रोडक्ट्स ज्यादा खरीदने का ऑफर दे रहे हैं, ताकि ईरानी तेल पर निर्भरता कम हो और होर्मुज खुलने तक सप्लाई बढ़े. अगर कोई डील होती है तो चीन अमेरिकी सोयाबीन, बोइंग विमान और एनर्जी के साथ-साथ कुछ रेयर अर्थ मिनरल्स पर भी सहमति दे सकता है.
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा का का मानना है कि पूरी क्राइसिस अभी खत्म नहीं होगी. होर्मुज पूरी तरह खुलने और शिपिंग सामान्य होने में समय लगेगा. चीन अपनी रिन्यूएबल एनर्जी (सोलर, EV) पर तेजी से काम कर रहा है, इसलिए लंबे समय में वह कम प्रभावित हो सकता है. अमेरिका और यूरोप जैसे देश अभी ज्यादा दबाव में हैं. ट्रंप कह रहे हैं कि जंग खत्म होते ही तेल की कीमतें ‘रॉक की तरह गिरेंगी’ और अमेरिका के लिए ‘गोल्डन एज’ आएगा, लेकिन फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है.
भारत ट्रंप के दौरे को कैसे देखता है?
ए. के. पाशा कहते हैं, ‘भारत इस मुलाकात को बहुत ध्यान से देख रहा है. भारत के लिए दोनों देश महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अमेरिका के साथ QUAD, डिफेंस और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप है, जबकि चीन के साथ व्यापार, BRICS और पड़ोसी संबंध हैं. इस मुलाकात से भारत की चितांएं भी हैं:
- अगर अमेरिका-चीन के रिश्ते बहुत ज्यादा सुधर गए और कोई बड़ा ट्रेड रीसेट हुआ तो भारत की स्ट्रैटेजिक वैल्यू (US के लिए चीन काउंटर के रूप में) कम हो सकती है.
- एनर्जी क्राइसिस से भारत भी प्रभावित है क्योंकि हम तेल आयात करते हैं. होर्मुज समस्या से तेल की कीमतें बढ़ीं तो महंगाई बढ़ेगी.
- रेयर अर्थ मिनरल्स और सप्लाई चेन पर अगर अमेरिका-चीन डील हुई तो भारत को भी नए अवसर या चुनौतियां मिल सकती हैं.
- भारत US-चीन टेंशन को बैलेंस करके फायदा उठाना चाहता है- न ज्यादा दुश्मनी, न ज्यादा दोस्ती.
इस मुलाकात के अच्छे पहलु भी हैं, जैसे अगर ट्रंप चीन से ईरानी तेल कम करवाने में कामयाब होते हैं तो मिडिल ईस्ट में कुछ स्थिरता आ सकती है, जो भारत के लिए अच्छा है. साथ ही, अगर अमेरिका चीन को कुछ छूट दे तो ग्लोबल मार्केट्स स्थिर हो सकते हैं.


