सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151ए की व्याख्या से जुड़े मुद्दे पर 22 सितंबर को सुनवाई करेगा। यह धारा संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडलों में रिक्त सीटों को भरने की समयसीमा से संबंधित है।

इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी रिक्त सीट के संबंध में संबंधित सदस्य का शेष कार्यकाल एक वर्ष या उससे अधिक का हो, तो निर्वाचन आयोग को रिक्ति की तिथि से छह महीने के भीतर उपचुनाव कराना अनिवार्य है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ निर्वाचन आयोग की ओर से दायर याचिका समेत दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2023 में पारित बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मार्च 2023 में तत्कालीन सांसद के निधन से रिक्त हुई पुणे लोकसभा सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश निर्वाचन आयोग को दिया था। इस मामले को लेकर मंगलवार को सुनवाई के दौरान पक्षों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने कहा कि अधिनियम की धारा 151ए की व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। एक अधिवक्ता ने दलील दी कि मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि निर्वाचन आयोग अलग-अलग उपचुनावों के मामलों में धारा 151ए की अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है।
अधिवक्ता ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि निर्वाचन आयोग मामलों का चयन अपनी सुविधा के अनुसार कर रहा है। इस पर पीठ ने कहा, इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151ए की व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। इसके बाद शीर्ष कोर्ट ने मामले को 22 सितंबर को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें निर्वाचन आयोग को पुणे लोकसभा सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश दिया गया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रिक्तियों के कारण होने वाले चुनावों के संबंध में वह दिशानिर्देश निर्धारित करेगी।