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नई दिल्ली31 मिनट पहले
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पेमेंट एग्रीगेटर्स ने भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI से मर्चेंट्स के री-केवाईसी के लिए तय 15 सितंबर की समयसीमा को आगे बढ़ाने की अपील की है। देश भर के लाखों छोटे, बड़े और रेहड़ी-पटरी वाले सेलर्स का केवाईसी वेरिफिकेशन बाकी है।
अगर समयसीमा नहीं बढ़ी, तो डिजिटल पेमेंट्स नेटवर्क में रुकावट आने और सर्विसेज प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
इस पूरे मामले के हर पहलू को 10 सवाल-जवाब में जानिए…
1. मामला क्या है और पेमेंट एग्रीगेटर्स ने RBI से क्या मांग की है?
पेमेंट एग्रीगेटर्स- पेटीएम, फोनपे, गूगल पे जैसी कंपनियों ने आरबीआई से मर्चेंट्स के लिए Re-KYC प्रोसेस पूरी करने की 15 सितंबर की डेडलाइन को बढ़ाने का अनुरोध किया है।
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के अनुसार, देश भर में हजारों मर्चेंट्स का केवाईसी बैकलॉग पड़ा हुआ है, जिसे समय पर पूरा करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
2. अगर 15 सितंबर की डेडलाइन नहीं बढ़ती है, तो इसका क्या असर होगा?
अगर समयसीमा नहीं बढ़ाई जाती है, तो ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों सेक्टरों में डिजिटल पेमेंट्स में बड़ी रुकावट आ सकती है।
जिन मर्चेंट्स का री-केवाईसी 15 सितंबर तक पूरा नहीं हो पाएगा, उनके पेमेंट एक्सेप्टेंस या मर्चेंट अकाउंट्स पर अस्थाई तौर पर रोक लग सकती है, जिससे रोजमर्रा के डिजिटल लेनदेन प्रभावित हो सकते हैं।
3. कितने मर्चेंट्स पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, UPI पेमेंट्स के लिए QR कोड का इस्तेमाल करने वाले लगभग 30% से 35% छोटे और अनौपचारिक ऑफलाइन मर्चेंट्स इस रेगुलेटरी टाइमलाइन को पूरा करने में चूक सकते हैं।
इसके अलावा लगभग 10 लाख छोटे ऑनलाइन बिजनेस भी तय समय में वेरिफिकेशन न हो पाने के जोखिम का सामना कर रहे हैं।
4. ऑफलाइन मर्चेंट्स के वेरिफिकेशन में क्या-क्या समस्याएं आ रही हैं?
पेटीएम, फोनपे और गूगल पे जैसी ऑफलाइन मर्चेंट एक्वायरिंग कंपनियों के पास देश के छोटे शहरों और गांवों में लाखों मर्चेंट्स हैं जो QR स्टेंडी और साउंडबॉक्स मशीनों का यूज करते हैं।
इनमें से कई छोटे और रेहड़ी-पटरी वाले सेलर्स हैं, जिनके पास डॉक्युमेंट्स नहीं हैं। सख्त केवाईसी नियमों और फिजिकल वेरिफिकेशन के कारण इन तक पहुंचना और डॉक्युमेंट्स जुटाना काफी कठिन साबित हो रहा है।
5. री-केवाईसी क्या है और यह क्यों जरूरी है?
नो योर कस्टमर यानी KYC एक ऐसी प्रोसेस है, जिसके जरिए फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन अपने यूजर या मर्चेंट की पहचान और पते का वेरिफिकेशन करती हैं।
धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग या अन्य अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने और पेमेंट्स सिस्टम की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित री-केवाईसी अनिवार्य है।
6. यह बैकलॉग की स्थिति क्यों बनी, नियम कब लागू हुए थे?
RBI ने सितंबर 2025 में अपडेटेड और कंसोलिडेटेड ‘मास्टर डायरेक्शंस’ जारी किए थे। इसमें पेमेंट एग्रीगेटर्स को औपचारिक रूप से तीन कैटेगरी में बांटा गया था- PA-ऑनलाइन, PA-फिजिकल और PA-क्रॉस बॉर्डर।
हालांकि RBI के दिशा-निर्देश पिछले साल ही आ गए थे और मर्चेंट्स व एग्रीगेटर्स दोनों के पास इनको अपनाने के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन प्रोसेस को आखिरी वक्त तक टालने की प्रवृत्ति के कारण यह बैकलॉग तैयार हो गया।
7. कंपनियों को वेरिफिकेशन में मैनपावर से जुड़ी क्या चुनौती आ रही है?
RBI के नियमों के अनुसार, इन-पर्सन यानी फिजिकल केवाईसी वेरिफिकेशन पेमेंट एग्रीगेटर के कर्मचारियों द्वारा ही किया जाना जरूरी है, इसे कोई थर्ड-पार्टी एजेंसी नहीं कर सकती हैं।
छोटे और अनौपचारिक मर्चेंट्स के बड़े नेटवर्क को सत्यापित करने के लिए कंपनियों को पिछले एक साल में बड़ी संख्या में नए कर्मचारियों को नियुक्त करना पड़ा है, फिर भी मैनपावर और कैपेसिटी की सीमाएं आड़े आ रही हैं।
8. क्या डेडलाइन तक पूरा काम खत्म होने की कोई संभावना है?
ज्यादातर पेमेंट एग्रीगेटर्स का मानना है कि वे डेडलाइन तक केवल 80% री-केवाईसी प्रोसेस ही पूरी कर पाएंगे। बाकी 20% मर्चेंट्स का बैकलॉग क्लियर करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत होगी।
9. क्या इससे कुल पेमेंट्स वैल्यू और वॉल्यूम पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा?
नहीं। प्रभावित हो रहे छोटे और रेहड़ी-पटरी वाले मर्चेंट्स की संख्या भले ही बहुत ज्यादा हो, लेकिन कुल डिजिटल पेमेंट के वॉल्यूम या वैल्यू में इनका योगदान काफी कम है।
इसलिए ओवरऑल पेमेंट इकोसिस्टम के कुल टर्नओवर पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा, हालांकि हर व्यक्ति तक वित्तीय सेवाओं की पहुंच और छोटे कारोबारियों की दैनिक गतिविधियों पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
10. पेमेंट इंडस्ट्री को RBI से क्या उम्मीद है?
पेमेंट इंडस्ट्री को उम्मीद है कि RBI राहत दे सकता है। एग्रीगेटर्स का कहना है कि RBI हमेशा से प्रैक्टिकल चुनौतियों को समझता रहा है और पेमेंट इकोसिस्टम में बिना किसी रुकावट के बदलाव सुनिश्चित करने के लिए इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम करता है।
जानें क्या है पेमेंट एग्रीगेटर और Re-KYC?
- पेमेंट एग्रीगेटर (PA): यह ऐसी सर्विस या संस्था है जो मर्चेंट्स यानी दुकानदारों/ई-कॉमर्स साइट्स को ग्राहकों से अलग-अलग माध्यमों जैसे- UPI, कार्ड, नेट बैंकिंग द्वारा डिजिटल पेमेंट्स स्वीकार करने की सुविधा प्रदान करती है।
- Re-KYC: ग्राहकों या मर्चेंट्स की जानकारी को अपडेट रखने के लिए समय-समय पर उनके पहचान पत्र, पते के प्रमाण और बिजनेस डिटेल्स की दोबारा जांच करने की प्रोसेस को री-केवाईसी कहा जाता है।



