पुणे की एक सत्र अदालत ने मंगलवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के एक पदाधिकारी को जमानत देते हुए कहा कि केवल सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना नहीं माना जा सकता। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.डी. कुलकर्णी ने एनसीपी (एसपी) के पदाधिकारी महादेव बलगुडे की जमानत याचिका मंजूर करते हुए कहा कि हर नागरिक को सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करने, उसकी सराहना करने और आलोचना करने का अधिकार है।
शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) के सोशल मीडिया प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रमुख महादेव बलगुडे को इस साल अप्रैल में गिरफ्तार किया गया था। उन पर सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की कथित रूप से मॉर्फ की गई तस्वीरें प्रसारित करने और नक्सलियों के प्रति सहानुभूति जताने वाली सामग्री पोस्ट करने का आरोप है।
कोर्ट ने कहा- यह सार्वजनिक विमर्श के दायरे में
बलगुडे पर अन्य धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 भी लगाई गई थी। यह धारा जानबूझकर या जानकारी होते हुए भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने से संबंधित है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले के दस्तावेजों से पता चलता है कि आरोपी ने कुछ मामलों में जांच प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं के कामकाज पर सवाल उठाए थे। यह सार्वजनिक विमर्श के दायरे में आता है।
अदालत ने कहा, “रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की घोषणा की या उसके लिए उकसाया हो अथवा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला कोई कार्य किया हो।” न्यायाधीश ने यह भी कहा कि मौजूदा मामले में बीएनएस की धारा 152 लागू होने का सवाल “बहस का विषय” है। साथ ही आरोपी पर लगाई गई अन्य धाराएं जमानती हैं।
कई शर्तों के साथ दी जमानत
अदालत ने कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। ऐसे में आरोपी से आगे हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है। जमानत देते हुए अदालत ने बलगुडे को 25 हजार रुपये के निजी मुचलके और एक या दो जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने, गवाहों को प्रभावित नहीं करने, जांच अधिकारी को अपना आवासीय पता और मोबाइल नंबर उपलब्ध कराने तथा अदालत की अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जाने का भी निर्देश दिया।
बलगुडे की ओर से पेश अधिवक्ता समीर शेख ने दलील दी कि मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और सरकार की आलोचना करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत संरक्षित है। उन्होंने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी से अब कुछ भी बरामद किया जाना शेष नहीं है। वहीं, अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने सोशल मीडिया पोस्ट में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और राज्य के खिलाफ अपराध किए हैं।


