भाजपा आलाकमान कई वर्षों से नए और अप्रत्याशित चेहरे को मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बना रही है, लेकिन दिल्ली के मामले में अलग रास्ता चुना गया है। मुख्यमंत्री के चयन की तरह प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी चौंकाने वाले फैसले की अटकलें थीं, लेकिन भाजपा ने अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को प्राथमिकता देते हुए को हर्ष मल्होत्रा को प्रदेश की कमान सौंप दी।

राजनीतिक हलकों में इसे रिवर्स गियर के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश भाजपा की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह फैसला अहम माना जा रहा है। पिछले कुछ समय से प्रदेश भाजपा में समन्वय की कमी और अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं सामने आ रहीं थीं। दिल्ली सरकार के साथ टकराव और नगर निगम के कामकाज में प्रदेश इकाई के हस्तक्षेप को लेकर भी असंतोष की स्थिति बताई जा रही थी।
निगम से जुड़े निर्णयों और राजनीतिक संचालन में बढ़ती दखलअंदाजी के कारण भाजपा पार्षदों के बीच गुटबाजी की चर्चा भी खुलकर सामने आई। ऐसे माहौल में पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत महसूस हो रही थी, जो संगठन पर नियंत्रण रखने के साथ विभिन्न धड़ों के बीच संतुलन भी बना सके।
हर्ष मल्होत्रा की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। उन्हें पार्टी में अनुशासनप्रिय और संगठन-केंद्रित नेता माना जाता है। जमीनी स्तर से राजनीति शुरू कर महापौर और फिर केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंचने वाले मल्होत्रा ने विवादों से दूरी बनाए रखी है। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश इकाई को दोबारा सक्रिय और अनुशासित बनाने की जिम्मेदारी उनके हाथों में सौंपने का निर्णय लिया।
भाजपा ने हर्ष मल्होत्रा को जिम्मेदारी देकर दिल्ली के अपने परंपरागत सामाजिक आधार को भी ध्यान में रखा है। मल्होत्रा पंजाबी समुदाय से आते हैं, जबकि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता बनिया समाज से हैं। ऐसे में पार्टी ने नेतृत्व के दोनों प्रमुख पदों के जरिए अपने पारंपरिक बनिया और पंजाबी वोट बैंक के बीच संतुलन और प्रतिनिधित्व का संदेश देने का प्रयास किया है।

