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Ground Report:नैरेटिव में Bjp आगे, बूथ पर Tmc भारी; 142 सीटों वाले दूसरे चरण के महासंग्राम में क्या रणनीति? – West Bengal Election 2026 Phase Two Voting Bjp Vs Tmc Booth Strategy Voter Turnout Narrative Battle Strategy

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92 प्रतिशत से अधिक मतदान ने सियासी माहौल को चरम पर पहुंचा दिया है। बंगाल की सियासत में पहला मौका है, जब नैरेटिव गढ़ने में भाजपा सत्ताधारी तृणमूल से आगे नजर आ रही है। हालांकि, ग्राउंड जीरो पर बूथ मैनेजमेंट अभी भी तृणमूल की सबसे बड़ी ताकत है।

हालांकि पहले चरण में बड़ा बदलाव यह दिखा कि पिछले चुनावों की तरह इस बार भाजपा के बूथ टेबल खाली नहीं रहे। अब मुकाबला सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और जमीनी पकड़ का हो गया है। दोनों ही दलों ने पहले चरण के बाद रणनीति की दिशा बदल दी है। नैरेटिव में बढ़त बनाने वाली भाजपा की कोशिश अगले चरण की 142 सीटों पर बूथ प्रबंधन की खामियों को दूर कर अभेद्य बनाने की है।

हुगली में नाव चलाकर पीएम नरेंद्र मोदी का मुतमईन दिखना, इसी हवा को चक्रवात में बदलने का टोटका है। दूसरी ओर, बूथों पर मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल बचाव की मुद्रा से बाहर आकर भाजपा के नैरेटिव को काउंटर करने में पूरी ऊर्जा लगा रही है। खुद ममता ने कमान संभालते हुए शाह और भाजपा पर प्रहार तेज कर जमीन पर अपना नैरेटिव भेजने की कोशिश में जुट गई है।

बंपर मतदान : सत्ता विरोधी लहर या प्रो-इनकंबेंसी

पहले चरण में करीब 93% मतदान दर्ज किया गया। 2011 में जब ममता ने वामपंथी किला ढहाया था, तब 84.7% मतदान हुआ था। 2021 में यह आंकड़ा करीब 82% था। इतनी ऊंची वोटिंग को लेकर विश्लेषण दो ध्रुवों में बंटा है। भाजपा सत्ता विरोधी लहर का ज्वार बता रही तो तृणमूल महिला और ग्रामीण वोटरों का सत्ता के पक्ष में समर्थन मान रही है।

दावों का मनोवैज्ञानिक युद्ध : अतिरेक या रणनीति

पहले चरण के मतदान के तुरंत बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 152 में से 110 सीटें जीतने का बड़ा दावा किया। वहीं, भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस आंकड़े को 125 सीटों तक पहुंचा दिया। राजनीतिक विशेषज्ञ इन दावों को हकीकत से ज्यादा काडर का मनोबल ऊंचा रखने का मनोवैज्ञानिक अतिरेक मान रहे हैं। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी आक्रामक हैं। उन्होंने इस भारी मतदान को बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ बंगाल की अस्मिता का जवाब और अपनी कल्याणकारी योजनाओं की जीत करार दिया है।

असली चुनौती:  शहरी उदासीनता को उत्साह में बदला

दावों के शोर से अलग असली चुनौती दूसरे चरण की 142 सीटों पर है, जहां कोलकाता और कलकत्ता प्रेसिडेंसी का शहरी इलाका निर्णायक है। ऐतिहासिक रूप से भद्रलोक कहे जाने वाले इस शहरी तबके में वोटिंग को लेकर उदासीनता रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां पूरे राज्य का औसत मतदान 82 प्रतिशत था, वहीं कोलकाता जिले में यह आंकड़ा महज 62 से 63 प्रतिशत के बीच सिमट गया था। प्रेसिडेंसी क्षेत्र की अन्य सीटों पर भी मतदान अक्सर 5 से 10 प्रतिशत तक कम रहता है। भाजपा मान रही है कि अगर शहरी वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, तो उसका सत्ता का दावा मजबूत होगा।

रणनीति का नया चरण

शहरी उदासीनता को भेदने के लिए दोनों दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है।

भाजपा का फुल-कोर्ट प्रेस : भाजपा ने पहले चरण के चुनाव से फ्री हुए अपने सभी पदाधिकारियों, उम्मीदवारों और अनुभवी कार्यकर्ताओं को दूसरे चरण की 142 सीटों पर उतार दिया है। लक्ष्य साफ है कि घर-घर जाकर शहरी वोटर को बूथ तक खींचना।

तृणमूल का काउंटर प्लान : तृणमूल ने भी हुबहू यही रणनीति अपनाते हुए मैन-टू-मैन मार्किंग शुरू कर दी है। तृणमूल कार्यकर्ता हर बूथ पर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनका कोर वोटर भ्रमित न हो और विपक्ष कोई नया नैरेटिव जमीन पर न उतार सके।

चार मई तक सियासी धक-धक

पहले चरण के अभूतपूर्व मतदान ने चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। अब दूसरे चरण में मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में ध्रुवीकरण, घुसपैठ और भ्रष्टाचार बनाम बंगाली अस्मिता की सीधी टक्कर है। अंतिम परिणाम 4 मई को सामने आएगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि बंगाल का यह चुनावी खेला अब महज़ नारों से आगे निकलकर बूथ प्रबंधन की सबसे कठिन परीक्षा बन चुका है। जीत उसी के कदम चूमेगी जो भद्रलोक को घर से निकालकर बूथ तक ले जाने में कामयाब होगा।

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