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Bhojshala Verdict:भोजशाला का अयोध्या कनेक्शन, 10 सिद्धांतों जिन पर टिका हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – Bhojshala Verdict High Court Bhojshala Verdict Supreme Court Ayodhya Judgment 10 Principles

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार जिले के विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने इस पूरे परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर घोषित किया है। अपने इस फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2019 के अयोध्या मामले में तय किए गए 10 ऐतिहासिक सिद्धांतों को मुख्य आधार बनाया है।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने स्पष्ट किया कि विवादित क्षेत्र के वास्तविक स्वरूप का निर्धारण करते समय इन 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी था। कोर्ट ने पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की अधिसूचनाओं और उसकी रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह निर्णय दिया है।

 

इस बड़े फैसले के मुख्य बिंदु और वे 10 सिद्धांत निम्नलिखित हैं:


1. सबूत का पैमाना: गणितीय निश्चितता नहीं, संभावनाओं की प्रबलता


हाईकोर्ट के अनुसार, अयोध्या फैसले का पहला सिद्धांत यह कहता है कि ऐसे संवेदनशील और ऐतिहासिक मामलों में सबूत का भार किसी गणितीय निश्चितता या ‘संदेह से परे प्रमाण’ पर आधारित नहीं होना चाहिए। इसके बजाय अदालतों को ‘संभाव्यता की प्रबलता’ (यानी किस पक्ष का दावा अधिक संभावित और मजबूत है) के मानक को स्वीकार करना चाहिए।

ये भी पढ़ें- भोजशाला पर एएसआई का बड़ा फैसला: नया आदेश जारी, अब बिना किसी रोक-टोक के होगी 365 दिन पूजा; मस्जिद का नाम हटा

2. धार्मिक पूर्णता नहीं, आस्था और निरंतरता की जांच

दूसरा सिद्धांत यह तय करता है कि आधुनिक अदालतों का काम किसी ढांचे की धार्मिक पूर्णता को खोजना नहीं है। अदालतों को यह देखना चाहिए कि आस्था, विश्वास, पूजा की निरंतरता, दान (बंदोबस्ती) की प्रकृति और उसका इतिहास क्या रहा है। साथ ही उपासकों का आचरण और धार्मिक उपयोग कितना पुराना और सुसंगत है, इसे जांचना जरूरी है।

3. देवता और दान की गई संपत्ति की रक्षा सर्वोपरि

तीसरे सिद्धांत के मुताबिक, देवता, दान में दी गई संपत्ति और उसके पीछे के धार्मिक उद्देश्य की रक्षा करना अदालतों का सबसे पहला और मुख्य लक्ष्य है। अगर जरूरत पड़े, तो देवता या उस धार्मिक उद्देश्य के हितों की रक्षा उसके भक्तों (लाभार्थियों) की ओर से की जा सकती है।

4. मूर्ति नष्ट होने से धार्मिक उद्देश्य खत्म नहीं होता

हाईकोर्ट ने चौथे सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि यदि कोई मूर्ति नष्ट हो जाती है या अपनी जगह पर मौजूद नहीं रहती, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उस स्थान का धार्मिक उद्देश्य या महत्व समाप्त हो गया है।

5. आस्था और विश्वास सर्वोपरि, हर बार दस्तावेजी सबूत मुमकिन नहीं

पांचवें सिद्धांत के तहत आधुनिक अदालतों के लिए यह मानना जरूरी है कि आस्था और विश्वास के मामले बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अदालतों को यह समझना होगा कि आस्था से जुड़ी हर बात को हमेशा सीधे दस्तावेजी साक्ष्यों से साबित करना मुमकिन नहीं होता।

6 व 7. सरकारी राजपत्र और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का महत्व

छठे और सातवें सिद्धांत में कोर्ट ने साफ किया कि आधिकारिक राजपत्रों का अपना एक मजबूत साक्ष्य मूल्य होता है। अगर सरकारी पत्राचार, प्रशासनिक नामकरण और समकालीन आधिकारिक रिकॉर्ड किसी विवादित स्थल की पहचान उसके धार्मिक या ऐतिहासिक संबंध के रूप में लगातार करते आ रहे हैं, तो उन्हें बड़े सबूत के तौर पर देखा जाएगा।

8. ‘उपयोगकर्ता की ओर से वक्फ’ का नियम

आठवां सिद्धांत ‘उपयोगकर्ता की ओर से वक्फ’ के कानूनी सिद्धांत से संबंधित है, जिसका आंकलन भी कोर्ट को ऐसे मामलों में करना होता है।

9. एएसआई की रिपोर्ट साक्ष्य का कमजोर रूप नहीं

नौवां सिद्धांत पुरातत्व विज्ञान से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान एक ऐसा विषय है जिसमें कई तरह के अंतर्विषयक दृष्टिकोण शामिल होते हैं। इसलिए एएसआई जैसे विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट बेहद मजबूत होती है और इसे साक्ष्य का कोई कमजोर रूप नहीं माना जा सकता।

10. धार्मिक प्रतीक, कला और शिलालेखों की अहमियत

दसवां सिद्धांत किसी संरक्षित या विवादित स्थल के धार्मिक चरित्र, ऐतिहासिक उपयोग और वहां पूजा की निरंतरता से संबंधित है। कोर्ट के अनुसार, यदि किसी स्थल पर दो पक्षों के प्रतिस्पर्धी दावे हों, तो वहां मौजूद धार्मिक रूपांकनों कला, मूर्तियों और प्राचीन शिलालेखों का प्रमाणिक मूल्य सबसे ऊंचा माना जाता है।

एएसआई ने जारी किया नया आदेश



मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भोजशाला परिसर को लेकर नया प्रशासनिक आदेश जारी किया है। नई व्यवस्था में एएसआई ने पहली बार इस ऐतिहासिक स्थल को प्रशासनिक रूप से राजा भोज द्वारा स्थापित “भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के नाम से संबोधित किया है। इससे पहले परिसर के साथ जुड़े “कमाल मौला मस्जिद” संबंधी उल्लेख को प्रशासनिक मान्यता नहीं दी गई थी।






क्या है भोजशाला का इतिहास



भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मान्यता के अनुसार यहां मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। कहा जाता है कि 12वीं और 13वीं शताब्दी के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण कराया गया।






रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के शोध पत्र ‘धार, भोज और सरस्वती’ के मुताबिक “भोजशाला” शब्द का पहली बार इस्तेमाल जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में किया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने भी इस स्थल का उल्लेख किया और यहां मिले संस्कृत शिलालेखों की व्याख्या शुरू करवाई। इसी दौरान यह बात सामने आई कि वर्तमान ढांचे का निर्माण ध्वस्त मंदिर के अवशेषों से किया गया था।

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