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Aaj Ka Shabd Parkeeya Anamika Ki Kavita Nayika Bhed – Amar Ujala Kavya – आज का शब्द:परकीया और अनामिका की कविता

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                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- परकीया, जिसका अर्थ है- किसी पुरुष की रक्षिता वह स्त्री जो किसी दूसरे पुरुष की विवाहिता हो। प्रस्तुत है अनामिका की कविता- नायिका भेद
                                                                 
                            

आचार्य हम इनमें कोई नहीं
कोई नहीं कोई नहीं कोई नहीं
मुग्धा प्रगल्मा विदग्धा या सुरतिगर्विता
परकीया भी नहीं न स्वकीया ही
मुग्धाएं जब थीं हम
देनी थी हमको परीक्षाएं
बोर्ड के सिवा भी कई
संस्थानों में प्रवेश की परीक्षाएं देते हुए
हमें फुर्सत ही नहीं मिली
आनन्द सम्मोहिता या रति को विदा होने की
रात में जगी भी हम तो मोटी पुस्तकों में सर खपाती हुई
चौराहे तक निकली भी जब अंधेरे में
मुदिता या अभिसारिका भाव से तो नहीं
घर के कपड़ों में बस निकल पड़ी
चुइंगम लाने की खातिर कि नींद भागे
प्ररूढ़यौवन हुई जब हम
नौकरी के सौ झमेले थे सर पर
वलासिकल स्वकीयाएं तन-मन से करती थीं
पतिगृह की सेवा हम तन-मन धन से
परिजन पुरजन की ससुराल-नैहर की
घर की और बाहर की
दत्तचित्त सेवाएं करती हुई
झेलती रहीं कचरमकुट्ट
स्वाधीनपतिका नहीं न ही स्थपत्तिका
आनन्दसम्मोहिता भी नहीं न ही कलहान्तरिता
कलह कभी करने का भी जी हुआ तो किससे करतीं
बालबुद्धि ही थे परमेश्वर हमारे
लगे ही नहीं वे कभी भी बराबर से
‘पिया मोर बालक हम तरुनी
पिया लेली गोदक चलली बजार’ का छंद साधती हुई
आज जिस बाज़ार में हम खड़ी न आचार्य जी
उसमें पहेली नहीं चुटकुला है हर जीव
तुमुल कोलाहल कहल का ऐसा
घनघोर सा सिलसिला है यहां
कबीर जी की लुकाठी से
सुलग रहे हैं बॉनफायर
दो चार ब्लॉगों पर
सुगबुगाता है कुछ री-मिक्स-सा
लुसफुसा रही कुछ इधर-उधर
बाज़ार से गुजरा हूं खरीददार नहीं हूं की
झिलमिल-सी अंतरपाठीयता
हां तो मैं यह कह रही थी
कि कुट्टिनी-खण्डिता वगैरह भी
हम तो नहीं है
हमारा अलग से ही बनना होगा प्रभेद
फूट गये हैं घड़े
सिकहर पर टंगे नौ रसों के
घाल-मेल हो गया है अब रसधारों का
वीर में वात्सल्य बहता है
शृंगार में बहती है कुछ भयावहता
शांत वीनस के घर चला गया है
और हास्य भी रौद्र से जा मिला है
हर क्षण हमार है नौ रसों का कॉकटेल
और हम भी हैं शायद मिश्र-प्रजाति वाले
बांस का टूसा
सुना था कहीं
चीन देश में होती है
बांसों की ऐसी प्रजाति
जिसका टूसा पड़ा रहता है
पचपन बरस धरती के भीतर
और तब जब चमकती है बिजली कहीं
धरती की छाती दरक जाती है
फोड़-फाड़कर सारी चट्टानें
झांकता है बांस का टूसा
धरती से बाहर
भूले भटके जो आ जाती हैं
मादक घटाएं उधर
उनकी छाया घूंट-भर पीकर
दिन दूनी रात चौगुनी गति से अचानक
बढ़ जाता है बांस का टूसा
यों बेहिसाब
कि उसकी गर्दन झुक जाती है
कोई भी कंधा नहीं मिलता
जिसपर टिके उसका माथा
हां हम समझती हैं उनका दुख
जिनको सर रखने को कोई भी कंधा नहीं मिलता
सन्न-सन्न बहती हैं सारी दिशाएं उनके भीतर
मलिनवस्त्र राधा का दुःख एक ऐसा ही दुख था
हरि के पसीने से भींग गया
और बिरह की धूप में सूखा
तार-तार आंचल वह राधा का
क्यों उंगलियों पर लपेटती थी राधा
यह हम समझती हैं
हालांकि किसी कृष्ण को हमने कभी भी
कहीं भी नहीं देखा
पर राधाएं हमने देखी हैं इधर-उधर
नागमती पद्मावत वाली
बड़े पलंग पर कहीं एक ओर लुढ़की पड़ी
या गहन बारिश में निपट अकेली
अपनी झोंपड़ी छवाती हुई
दीखती है कैसी
जानती हैं हम ये अच्छी तरह से!
कुछ हममें अब भी बचा है दुख
अपभ्रंश गीतों की चिर विरहिनों का
युद्ध से घायल हो कर लौटे घोड़े का
दुःख जानती हैं हम
जानती हैं हम
जानती हैं ये कि लगता है कैसा जब
घुड़साल में उनको कहीं एक ओर बांधकर
अनमने कदमों से चल देता है घुड़सवार
और कभी वापस नहीं लौटता
धीरे-धीरे भूल जाता है पोर-पोर उसका
क्या होता है खरहरा
और नाल गप से गले मिलती है कैसे
कटे-फटे खुर भूल जाते हैं
अच्छी तरह हम समझती हैं
हर बात पर चौंकती हैं क्यों
उत्कंठिताएं
धीरा-अधीरा वो रहती है क्योंकर?
काम नहीं आते क्यों उनके
वर्षों से संचित संज्ञान और अनुभव?
क्यों खोटे सिक्के हो जाते हैं
सारे शुभाशय?
बजता नहीं कभी भूल से फिर भी
हाथों में क्यों हरदम रखती हैं
अपना मोबाइल?
क्यों ध्यान से पढ़ती है मेसेज
विज्ञापन कम्पनियों के
अपना धुंधला चश्मा पोंछकर
किसका है इंतजार इनको
कोई कभी भी नहीं आता इनके सिरहाने
सिर्फ एक वैद्यराज आते हैं
और भटकटैया में अश्वगंधा की
बस भावना मिलाकर
कुछ रसायन-सा पिलाते हैं
गौरेया की नींद सोती है
और छपाक जाग जाती है
जो आधी रात कुहकती है कुरलियां
सूखी तलैया में
छाती पर हाथ धरे सोचती हैं कुछ-कुछ
छाती पर हाथ धरे क्या सोचती हैं?
ये वृद्धा पादमिनी नायिकाएं
नहीं किया जौहर जिन्होंने
और अंत-अंत तक लड़ीं
अनुपम धीरोदात्तता से?

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8 घंटे पहले

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