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Aaj Ka Shabd Malinya Ramdhari Singh Dinkar Ki Kavita Prem Ka Sauda Bada Anmol Re – Amar Ujala Kavya – आज का शब्द:मालिन्य और रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता

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‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मालिन्य, जिसका अर्थ है- मलीनता, मैलापन। प्रस्तुत है रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता- प्रेम का सौदा बड़ा अनमोल रे !

सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,


एक पथ, बलि के लिए तैयार हो ।

फूँक दे सोचे बिना संसार को,


तोड़ दे मँझधार जा पतवार को ।

कुछ नई पैदा रगों में जाँ करे,


कुछ अजब पैदा नया तूफाँ करे।

हाँ, नईं दुनिया गढ़े अपने लिए,


रैन-दिन जागे मधुर सपने लिए ।

बे-सरो-सामाँ रहे, कुछ गम नहीं,


कुछ नहीं जिसको, उसे कुछ कम नहीं ।

प्रेम का सौदा बड़ा अनमोल रे !


निःस्व हो, यह मोह-बन्धन खोल रे !


  


मिल गया तो प्राण में रस घोल रे !


पी चुका तो मूक हो, मत बोल रे !

प्रेम का भी क्या मनोरम देश है !


जी उठा, जिसकी जलन निःशेष है ।

जल गए जो-जो लिपट अंगार से,


चाँद बन वे ही उगे फिर क्षार से ।

प्रेम की दुनिया बड़ी ऊँची बसी,


चढ़ सका आकाश पर विरला यशी।

हाँ, शिरिष के तन्तु का सोपान है,


भार का पन्थी ! तुम्हें कुछ ज्ञान है ?

है तुम्हें पाथेय का कुछ ध्यान भी ?


साथ जलने का लिया सामान भी ?

बिन मिटे, जल-जल बिना हलका बने,


एक पद रखना कठिन है सामने ।


 


प्रेम का उन्माद जिन-जिन को चढ़ा,


मिट गए उतना, नशा जितना बढ़ा ।

मर-मिटो, यह प्रेम का शृंगार है।


बेखुदी इस देश में त्योहार है ।

खोजते -ही-खोजते जो खो गया,


चाह थी जिसकी, वही खुद हो गया।

जानती अन्तर्जलन क्या कर नहीं ?


दाह से आराध्य भी सुन्दर नहीं ।

‘प्रेम की जय’ बोल पग-पग पर मिटो,


भय नहीं, आराध्य के मग पर मिटो ।

हाँ, मजा तब है कि हिम रह-रह गले,


वेदना हर गाँठ पर धीरे जले।

एक दिन धधको नहीं, तिल-तिल जलो,


नित्य कुछ मिटते हुए बढ़ते चलो ।

पूर्णता पर आ चुका जब नाश हो,


जान लो, आराध्य के तुम पास हो।

आग से मालिन्य जब धुल जायगा,


एक दिन परदा स्वयं खुल जायगा।

आह! अब भी तो न जग को ज्ञान है,


प्रेम को समझे हुए आसान है ।

फूल जो खिलता प्रल्य की गोद में,


ढूँढ़ते फिरते उसे हम मोद में ।

बिन बिंधे कलियाँ हुई हिय-हार क्या?


कर सका कोई सुखी हो प्यार क्या?

प्रेम-रस पीकर जिया जाता नहीं ।


प्यार भी जीकर किया जाता कहीं?

मिल सके निज को मिटा जो राख में,


वीर ऐसा एक कोई लाख में।

भेंट में जीवन नहीं तो क्या दिया ?


प्यार दिल से ही किया तो क्या किया ?

चाहिए उर-साथ जीवन-दान भी,


प्रेम की टीका सरल बलिदान ही।

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