राजोरी के डोरिमल-गंभीर मुगला इलाके में ऑपरेशन शेरूवाली के दौरान मूसा को गोली लगी थी। इसके बाद जंगल में छिपे रहने के दौरान उसने घावों पर शहद लगाया। सुरक्षा घेरा होने के कारण उसे चिकित्सकीय उपचार नहीं मिल पा रहा था, इसलिए उसने शहद का इस्तेमाल घाव भरने और संक्रमण से बचाव के लिए किया।
यासिर के फोन से मिलीं मूसा के घावों की तस्वीरें
अधिकारियों ने बताया कि सितंबर के पहले सप्ताह में यूसमर्ग के ऊंचाई वाले इलाके में मारे गए आतंकी यासिर के फोन से मूसा के घावों की तस्वीरें मिली थीं। इन तस्वीरों को सीमा पार मौजूद उसके हैंडलरों तक भेजा गया था ताकि उन्हें मूसा की स्थिति की जानकारी मिल सके। बताया गया है कि हैंडलर शहद के शुद्ध होने पर भी जोर दे रहे थे ताकि घाव जल्द भर सकें।
आयुर्वेद में घावों की देखभाल में शहद का उल्लेख
ऑल इंडिया डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. आरपी पाराशर के मुताबिक आयुर्वेद में शहद का इस्तेमाल लंबे समय से घावों की देखभाल के लिए किया जाता रहा है। उन्होंने बताया कि शहद में मौजूद कुछ गुण बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने और घाव के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि गोली के घाव का इलाज केवल शहद से करना चिकित्सकीय रूप से पर्याप्त नहीं है। ऐसे घावों को अच्छी तरह साफ करना और चिकित्सकीय देखभाल देना जरूरी है। घाव पर इस्तेमाल के लिए मेडिकल-ग्रेड, स्टेराइल शहद ही सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि सामान्य शहद से संक्रमण का खतरा हो सकता है।
पांच साल से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर था मूसा
मूसा जम्मू-कश्मीर में करीब पांच साल से सुरक्षा एजेंसियों की तलाश में था। इस सप्ताह मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग में ऊंचाई वाले इलाके में सेना के अभियान के दौरान उसे मार गिराया गया।
अधिकारियों ने उस पर एक दर्जन से अधिक आतंकी हमलों में शामिल होने का आरोप लगाया। इनमें अप्रैल 2023 का पुंछ के भाटा धुरियां में हमला शामिल है, जिसमें पांच जवान शहीद हुए थे। मई 2023 में राजोरी के कांडी जंगल में हुए विस्फोट में भी पांच कमांडो मारे गए थे।
दिसंबर 2023 में पुंछ के डेरा की गली में हुए हमले में चार सैन्यकर्मी मारे गए थे। मई 2024 में शासितार के पास भारतीय वायुसेना के काफिले पर हमले में एक जवान की मौत हुई थी। इसके अलावा अक्टूबर 2024 में गांदरबल के गगनगीर सुरंग निर्माण स्थल पर हुए हमले में सात लोगों की मौत हुई थी। इसके चार दिन बाद बुटापथरी में सेना के वाहन पर हुए हमले में दो जवानों और दो नागरिक रक्षा पोर्टरों की मौत हुई थी।

