दुनिया भर में ईंधन की बढ़ती कीमतों और तेल बाजार में जारी अस्थिरता के बीच G7 देशों ने 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन भंडार जारी करने का फैसला किया है. इस फैसले का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और ईंधन की कीमतों पर दबाव कम करना है.
G7 के इस फैसले के तहत IEA के साथ आपातकालीन भंडार से तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद जारी किए जाएंगे. ये प्रक्रिया तत्काल शुरू होगी और करीब चार महीने तक चलेगी.
20 दिनों में डीजल की सप्लाई बढ़ेगी
G7 की योजना में डीजल को प्राथमिकता दी गई है. समूह के मुताबिक शुरुआती 20 दिनों में डीजल का एक बड़ा हिस्सा बाजार में उतारा जाएगा, ताकि रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची डीजल कीमतों पर तत्काल दबाव कम किया जा सके. इसके बाद बाकी भंडार को अगले चार महीनों के दौरान जारी किया जाएगा.
ये कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और यूरोप समेत कई बाजारों में डीजल की कीमतों में तेज उछाल आया है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में डीजल की राष्ट्रीय औसत कीमत शुक्रवार को 6.37 डॉलर प्रति गैलन रही, जबकि सितंबर में ये रिकॉर्ड 6.52 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी. यूरोप में भी डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हैं.
रूस-यूक्रेन और ईरान संकट का असर
वैश्विक ईंधन बाजार पर कई मोर्चों से दबाव बना हुआ है. ईरान युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और रिफाइनरियों से जुड़ी सप्लाई बाधाओं ने तेल और रिफाइंड उत्पादों की प्रभावित की है. रूस द्वारा रिफाइनरी पर यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बाद निर्यात पर रोक लगाए जाने से भी डीजल की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ा है.
डीजल एक्सपोर्ट बैन से क्या हुआ?
G7 का यह फैसला अमेरिका में डीजल निर्यात पर संभावित प्रतिबंध की चर्चा के बीच आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बाद में कहा कि अमेरिका डीजल निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा. G7 देशों ने भी अपने संयुक्त बयान में ऊर्जा और ऊर्जा उत्पादों के आपसी निर्यात पर बैन नहीं लगाने की प्रतिबद्धता जताई है.
अमेरिकी प्रशासन पर बढ़ती ईंधन कीमतों को लेकर दबाव था. डीजल की महंगाई का असर खेती, माल ढुलाई, शिपिंग और दूसरे कारोबारों की लागत पर पड़ता है.
क्या भारत में मिलेगा फायदा?
G7 के इस कदम का असर केवल अमेरिका और यूरोप तक सीमित नहीं रह सकता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और डीजल की उपलब्धता बढ़ने से वैश्विक आपूर्ति पर दबाव कम हो सकता है. हालांकि, भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर इसका असर कई कारकों पर निर्भर करेगा, जिनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत और घरेलू कर शामिल हैं.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक तेल बाजार में किसी भी बड़े बदलाव का असर भारतीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है.
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