दुनियाभर के समंदर में कच्चा तेल ढोने वाले बड़े जहाजों यानी ऑयल टैंकरों की भारी कमी हो गई है. इसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है, क्योंकि देश तक तेल पहुंचाने का खर्च बहुत तेजी से बढ़ गया है. 19 सितंबर तक मिली रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले अमेरिका से एशिया तक तेल लाने का भाड़ा करीब 26 डॉलर यानि लगभग 2,300 से 2,400 रुपये प्रति बैरल बढ़ चुका है.
इसका सीधा मतलब यह है कि सिर्फ एक बड़े जहाज का किराया ही करीब 52 मिलियन डॉलर, लगभग 430 करोड़ रुपये बढ़ गया है, जो उस जहाज में भरे कुल तेल की कीमत के करीब 25 फीसदी के बराबर है.
किन रास्तों पर कितना बढ़ा किराया?
यह परेशानी सिर्फ अमेरिका वाले लंबे रास्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि जिन देशों से भारत आमतौर पर तेल खरीदता है वहां से भी जहाजों का किराया रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है. खाड़ी देशों से भारत तक तेल लाने का भाड़ा फरवरी 2026 में सिर्फ 10.6 डॉलर प्रति टन था. यही भाड़ा अगस्त में बढ़कर 34.6 डॉलर और सितंबर में 61.9 डॉलर प्रति टन हो गया. वहीं रूस से भारत तेल लाने का खर्च भी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है, जो अब 20 से 23 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बैठ रहा है.
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अचानक जहाजों की कमी क्यों हो गई?
युद्ध और समुद्री रास्तों पर बढ़ता खतरा जानकारों का कहना है कि यह संकट किसी एक वजह से नहीं बल्कि कई मुश्किलों के एक साथ आने से बना है. फरवरी 2026 से अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग के चलते होर्मुज के रास्ते जहाजों का निकलना बहुत खतरनाक हो चुका है.
दुनिया का 20 फीसदी और भारत की जरूरत का करीब 45 फीसदी तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है. इसके अलावा यमन के हूती लड़ाके लाल सागर में जहाजों पर हमले कर रहे हैं और 11 सितंबर को सऊदी अरब की मुख्य पाइपलाइन पर भी हमला हुआ. पाइपलाइन बंद होने से तेल कंपनियों को मजबूरी में जहाजों का इस्तेमाल करना पड़ा जिससे जहाजों की मांग अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई.
पुराने जहाज और नए कड़े नियम
रूस पर लगी पाबंदियों के बाद रूसी तेल ढोने वाले जहाजों को आम कारोबार से अलग करके ‘शैडो फ्लीट’ (छुपे हुए जहाजों का बेड़ा) बना दिया गया है. दुनिया के करीब 20 फीसदी जहाज इसी चक्कर में फंसे हैं. दूसरी तरफ दुनियाभर में तेल ढोने वाले जहाज काफी पुराने हो चुके हैं और नए जहाज बन नहीं रहे हैं साल 2024 में तो पूरी दुनिया में सिर्फ एक नया बड़ा तेल टैंकर बनकर तैयार हुआ था.
ऊपर से अमेरिका ने 18 सितंबर 2026 को ‘ग्राहम एक्ट’ पास किया है. इस कानून के तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों खासकर भारत और चीन पर 100 फीसदी तक टैक्स लगाने की बात कही गई है. भले ही यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति की मर्जी पर निर्भर है, लेकिन इसने शिपिंग बाजार में डर और अनिश्चितता बढ़ा दी है.
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भारत पर इसका क्या असर पड़ रहा है?
भारत अपनी जरूरत का करीब 88.7 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है. इसलिए जहाज का भाड़ा बढ़ते ही देश की जेब पर सीधा बोझ पड़ता है. चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच भारत का तेल आयात बिल 48 फीसदी बढ़कर 74.8 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि तेल की मात्रा पहले जितनी ही थी यानी यह पूरा अतिरिक्त खर्च सिर्फ बढ़ी हुई कीमतों और महंगे भाड़े की वजह से हुआ है.
भारत अभी भी रूस से रोजाना करीब 1.6 मिलियन बैरल तेल ले रहा है, लेकिन पहले मिलने वाली भारी छूट अब लगभग खत्म हो चुकी है. ऊपर से भारी भाड़े के चलते रूसी तेल खरीदने से होने वाली बचत भी अब न के बराबर रह गई है.
क्या पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे?
कच्चा तेल और भाड़ा महंगा होने से देश में महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है. रिजर्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल में 10 डॉलर प्रति बैरल की तेजी घरेलू महंगाई को करीब आधा फीसदी तक बढ़ा देती है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक कंपनियों को रोज करीब 1,000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है.
सरकार का क्या कहना है?
पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि लोगों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है. भारत के पास अपनी जरूरत का करीब 60 से 69 दिनों का तेल स्टॉक में रखा हुआ है और देश की रिफाइनरियां पूरी रफ्तार से काम कर रही हैं. किसी एक देश या रास्ते पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार ने अब 27 के बजाय 41 देशों से तेल खरीदना शुरू किया है जिसमें अमेरिका, ब्राजील, इराक और अफ्रीकी देश शामिल हैं.
यह पूरी परेशानी तेल की कमी की नहीं बल्कि तेल को भारत तक लाने में लगने वाले महंगे किराये की है. देश में तेल की कोई किल्लत नहीं है लेकिन अगर समंदर में यह तनाव और जहाजों की कमी लंबे समय तक खिंचती है तो इसका असर आने वाले दिनों में आम आदमी के बजट और रोजमर्रा के सामानों के दाम पर पड़ सकता है.

