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डूसू चुनाव:कैंपस से सत्ता तक हर बार एक जैसी नहीं रही कहानी, परिसर की पसंद को दिल्लीवाले करते रहे खारिज – Dusu Elections: The Story From Campus To Power Hasn’t Always Been The Same

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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव को राजधानी की राजनीतिक नर्सरी कहा जाता है। यहां की जीत को अक्सर इस बात का संकेत माना जाता है कि किस छात्र संगठन की जमीन मजबूत है और भविष्य की राजनीति में उसकी पकड़ कितनी हो सकती है। 

मगर 1993 से 2025 तक डूसू और उसके बाद हुए दिल्ली के विधानसभा, लोकसभा व नगर निगम चुनावों के नतीजे बताते हैं कि कैंपस का फैसला हमेशा दिल्ली के मतदाताओं का फैसला नहीं बना। कई बार दोनों के रुझान एक दिशा में गए, तो कई बार डूसू में जीतने वाला संगठन मुख्यधारा की राजनीति में उसी समय बिल्कुल अलग तस्वीर देखता रहा।

कैंपस की जीत, सत्ता की गारंटी नहीं

डूसू के तीन दशक से अधिक के चुनावी इतिहास का सबसे अहम संकेत यही है कि कैंपस की हवा को सीधे दिल्ली की राजनीतिक हवा मानना आसान है, लेकिन नतीजे हमेशा इसकी पुष्टि नहीं करते। डूसू का चुनाव सीमित छात्र मतदाताओं, विश्वविद्यालय के मुद्दों और छात्र संगठनों की सक्रियता पर आधारित है, जबकि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदाताओं का दायरा और मुद्दे कहीं व्यापक   होते हैं।

जहां डूसू और दिल्ली साथ चले


  • वर्ष 1993 डूसू में एनएसयूआई की सफलता के बाद उसी साल दिल्ली विधानसभा चुनाव हुआ। विधानसभा में भाजपा ने 49 सीट जीतकर सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस को 14 सीट मिलीं।1996 में डूसू में एबीवीपी की सफलता के बाद 1997 के नगर निगम चुनाव में भाजपा सत्ता में आई। 1997 में एबीवीपी ने डूसू के चारों केंद्रीय पद जीत लिए और अगले साल लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सात में छह सीटें अपने नाम कीं। 1999 में भी डूसू अध्यक्ष पद एबीवीपी के पास रहा और उसी वर्ष भाजपा ने लोकसभा की सभी सात सीटें जीत लीं।

  • इसी तरह 2001 से 2004 के बीच एनएसयूआई की डूसू में सफलता के साथ दिल्ली की मुख्यधारा की राजनीति में भी कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहा। 2002 के नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद 2003 में उसने 47 विधानसभा सीटें जीतीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने दिल्ली की सात में छह सीटें अपने नाम कीं।

  • 2013 और 2014 का दौर भी कैंपस और लोकसभा की राजनीति के बीच समानता का उदाहरण रहा। 2013 में एबीवीपी ने डूसू के चार में तीन पद जीते और इसके कुछ ही महीने बाद भाजपा विधानसभा में 31 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। 2014 में एबीवीपी ने चारों केंद्रीय पद जीते और उसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर जीत दर्ज की।

विधानसभा चुनाव ने कई बार काटी राह


  • डूसू के नतीजों और दिल्ली की राजनीति के बीच सबसे बड़ा अंतर विधानसभा चुनावों में नजर आया। 1993 में एनएसयूआई की डूसू में सफलता के बावजूद विधानसभा में भाजपा ने 49 सीटें जीतकर सरकार बनाई। 1997 में एबीवीपी के क्लीन स्वीप के बाद 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने छह सीटें जीतीं, लेकिन उसी साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 52 सीटों के साथ सत्ता में लौट आई।

  • 2008 में एबीवीपी ने अध्यक्ष पद जीता, मगर विधानसभा में कांग्रेस ने 43 सीटों के साथ लगातार तीसरी बार सरकार बनाई। 2014 में एबीवीपी की चारों केंद्रीय पदों पर जीत के बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर और भी अलग रही। आम आदमी पार्टी ने 70 में 67 सीटें जीतकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के राजनीतिक समीकरण बदल दिए।

  • 2019 में एबीवीपी ने डूसू के तीन केंद्रीय पद जीते। उसी वर्ष भाजपा ने लोकसभा की सभी सात सीटें जीतीं, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी 62 सीटों के साथ सत्ता में लौटी। 2023 में एबीवीपी ने डूसू के तीन पद जीते और 2024 में भाजपा ने लोकसभा की सभी सात सीटें बरकरार रखीं। 2024 के चुनाव में अध्यक्ष पद एनएसयूआई के खाते में जाने के बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 48 सीटें जीतकर सरकार बनाई।

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