श्रावण-भाद्रपद मास में निकलने वाली विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की सवारी में हर साल लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। भारी भीड़ के कारण कई बार श्रद्धालु पालकी में विराजमान बाबा महाकाल के दर्शन नहीं कर पाते। हालांकि, बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि सवारी में बाबा महाकाल के एक समान दो मुखारविंद एक साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इनमें एक मुखारविंद पालकी में विराजमान रहता है, जबकि दूसरा हाथी पर सवार होता है। परंपरा के अनुसार, दोनों में से किसी भी स्वरूप के दर्शन करने पर श्रद्धालुओं को समान पुण्य लाभ प्राप्त होता है।
अनादिकाल से चली आ रही है अनोखी व्यवस्था
महाकाल मंदिर के पुजारी पंडित महेश गुरु ने बताया कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा पालकी या हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते थे। इसी परंपरा को ध्यान में रखते हुए पूर्वजों ने भक्तों की सुविधा के लिए बाबा महाकाल के एक समान दो मुखारविंद तैयार करवाए थे। तभी से यह अनोखी परंपरा चली आ रही है।
पंडित महेश गुरु के अनुसार, जो श्रद्धालु भीड़ के कारण पालकी में विराजमान महाकाल राजा के दर्शन नहीं कर पाते, वे हाथी पर सवार महाकाल राजा के स्वरूप के दर्शन कर सकते हैं। ऊंचाई पर होने के कारण हाथी पर विराजमान स्वरूप के दर्शन अपेक्षाकृत आसानी से हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश श्रद्धालुओं को इस व्यवस्था की जानकारी नहीं है और उनका पूरा ध्यान पालकी पर ही रहता है। ऐसे में मंदिर प्रबंध समिति को इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी इस सुविधा की जानकारी प्राप्त कर सकें।
कड़ाबीन के धमाके और राजसी ठाट-बाट
उज्जैन के राजाधिराज बाबा महाकाल जब अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो सवारी का स्वरूप राजसी वैभव से भर जाता है। सवारी शुरू होने से पहले कड़ाबीन के धमाकों के साथ पूरे शहर को महाकाल राजा के नगर भ्रमण की सूचना दी जाती है। मंदिर से सवारी निकलने के दौरान बाबा महाकाल को मध्य प्रदेश पुलिस के सशस्त्र बल द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। पुलिस बैंड की स्वर लहरियां और सशस्त्र जवानों की कदमताल सवारी की भव्यता को और बढ़ा देती है। जब महाकाल राजा पालकी और हाथी पर विराजमान अपने दोनों स्वरूपों के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो यह अद्भुत और अलौकिक दृश्य श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देता है।


